उम्र छुपाना क्यों...?
चाहे कोई कितना भी सच बोलता हो, किंतु उम्र के मामले में अक्सर लोग सच्चाई से थोड़ा पीछे हट जाते हैं। क्या कभी हमने सोचा है जिसके साथ हम चलना, बोलना, पढ़ना, लिखना सब कुछ सीखते हैं, जो हमें अपने साथ समझदार, परिपक्व, और अनुभवी बनाती है, उसी उम्र को हम अक्सर पर्दे में रखना क्यों पसंद करते हैं?
उम्र एक प्राकृतिक तथ्य है, जिसका समय के साथ बढ़ना तय है। किंतु उम्र छुपाकर रखना भी एक सामान्य प्रवृत्ति है, जो राजा-महाराजाओं के समय से चली आ रही है। प्राचीन समय में राजा की ढलती उम्र को राज्य की असुरक्षा के साथ जोड़ दिया जाता था। अर्थात राजा की बढ़ती उम्र मतलब कमजोर राजा, और कमजोर राजा मतलब असुरक्षित राज्य। इसलिए राजा की उम्र अक्सर छुपाई जाती थी।
लेकिन उम्र छुपाने की प्रवृत्ति इतिहास तक सिमट कर नहीं रह गई, आज भी लोगों में उम्र छुपाने की प्रवृत्ति देखी जाती है, जिसके मूल में दो कारण देखे जाते हैं:
१. सामाजिक दबाव २. मनोवैज्ञानिक कारण
१. सामाजिक दबाव
उम्र छुपाने की प्रवृत्ति का सामाजिक दबाव के साथ बहुत गहरा संबंध है। हमारे जीवन के हर पड़ाव को समाज के द्वारा उम्र के एक निश्चित दायरे में समेट दिया गया है। उदाहरण स्वरूप—आजकल 3 साल की उम्र में बच्चों का स्कूल में नामांकन हो जाता है। लेकिन हो सकता है कि किसी बच्चे को 3 साल की उम्र में स्कूल जाने के लिए तैयार न किया जा सके, बल्कि उसमें 5-6 साल की उम्र में स्कूल जाने लायक समझ विकसित हो पाए। सभी बच्चों में बढ़ने की गति अलग-अलग होती है जो कि उसके पारिवारिक और सामाजिक परिवेश पर निर्भर करती है। ऐसे में विद्यालय में बच्चों की उम्र घटाकर बताना अभिभावकों की विवशता हो जाती है।
यही बात बड़ों पर भी लागू होती है। हर व्यक्ति अपने जीवन में निरंतर आगे की ओर बढ़ता रहता है, अंतर सिर्फ गति का होता है। व्यक्ति के आगे बढ़ने की गति उसकी मानसिक-शारीरिक स्थिति, पारिवारिक स्थिति तथा उसके आसपास के वातावरण पर निर्भर करती है। समाज के द्वारा जो टाइमलाइन निर्धारित की गई है उसका आधार व्यक्ति की उम्र है, जो है— 21-22 की उम्र तक पढ़ाई पूरी, 25 की उम्र तक नौकरी, 32 की उम्र तक घर बसाना और एक व्यवस्थित जीवन शैली में आ जाना।
लेकिन हो सकता है कि कोई पढ़े-लिखे संपन्न परिवार से हो, स्वस्थ तन और मन का स्वामी हो; वहीं कोई दूसरा ग्रामीण परिवेश, गरीब परिवार तथा कमजोर तन और ढेरों चिंताओं को ढोता हुआ कमजोर मन का स्वामी हो। कोई 25 की उम्र में ही पूर्णतः व्यवस्थित जीवन शैली में आ जाए, तो कोई 35 की उम्र में भी संघर्ष करता रहे। किंतु हमारे समाज की अपेक्षा उम्र के अनुसार होती है, जो कि बिल्कुल गलत है।
किसी व्यक्ति के आगे बढ़ने की गति उसकी स्थिति पर निर्भर करती है, न कि उसकी उम्र पर। लेकिन सामाजिक अपेक्षाओं के दबाव के कारण यदि किसी व्यक्ति की गति समाज के द्वारा निर्धारित उम्र की गति से धीमी हो, तो वहाँ उम्र छुपाने की प्रवृत्ति विकसित हो जाती है। सवाल यह उठता है कि जब हर व्यक्ति की पारिवारिक स्थिति, मानसिक-शारीरिक स्थिति, उसका सामाजिक परिवेश अलग-अलग होता है, तो सबके लिए उम्र की एक जैसी टाइमलाइन का निर्धारण कहाँ तक उचित है? ध्यान देने योग्य बात यह है कि सबकी परिपक्वता की उम्र भी एक नहीं होती; कोई जल्दी परिपक्व हो जाता है तो कोई देर से। सबकी बुद्धि-लब्धि (IQ) भी अलग-अलग होती है, ऐसे में सबसे एक जैसी अपेक्षा रखना कहाँ तक सही है?
२. मनोवैज्ञानिक कारण
उम्र छुपाने की प्रवृत्ति मुख्य रूप से हमारी मानसिक स्थिति से जुड़ी हुई है। मनुष्य मूलतः एक सक्रिय प्राणी है, वह खाली बैठ ही नहीं सकता। विशेषकर हमारा दिमाग हर समय कार्य करता रहता है। मनुष्य निरंतर अपने व्यक्तित्व पर काम करता रहता है और समाज में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाने का प्रयास करता रहता है। किंतु समाज अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाने की चाह को भी उम्र के दायरे में समेट देता है।
चाहे सुंदरता हो, सक्रियता हो या फिर रचनात्मकता हो—इन सबका केंद्र हमारा समाज युवावस्था को मानता है। उदाहरण स्वरूप, यदि कोई 20 वर्ष का व्यक्ति कहता है कि "उसे अपनी पहचान बनानी है, कुछ करना है", तो लोग उसे प्रोत्साहित करेंगे। किंतु यही बात कोई 40-45 का व्यक्ति कहे, तो "अब तुम्हें क्या करना है", "अब तक कुछ न हुआ तो अब क्या करोगे" जैसे वाक्य उसका मनोबल तोड़कर रख देंगे। जबकि हो सकता है कि कोई 20 साल का हो किंतु उसमें वैसी सक्रियता न हो, वहीं कोई 40-50 वर्ष का हो और सक्रिय होकर किसी कार्य को करे और समाज में अपनी एक विशिष्ट पहचान बना ले।
ऐसे कई उदाहरण भी हैं:
- दशरथ मांझी: युवावस्था में साधारण मजदूर थे। बाद में 50 वर्ष की आयु में पहाड़ तोड़कर गाँव के लिए सड़क बनाने का काम शुरू किया। अकेले प्रयास से 360 फीट लंबी सड़क बनाई। आज उन्हें 'माउंटेन मैन' के नाम से जाना जाता है।
- एनालिसा मोयेस: इन्होंने 70 की उम्र में पेंटिंग शुरू की और कला के क्षेत्र में अपनी एक विशिष्ट पहचान बना ली।
- दीपा मलिक: यह पैरा एथलीट हैं, जिन्होंने 40 वर्ष से ऊपर की उम्र में प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेकर देश के लिए पदक और सम्मान हासिल किया।
सच तो यह है कि सक्रियता तथा रचनात्मकता उम्र की मोहताज नहीं होती तथा हर उम्र की अपनी एक सुंदरता होती है। लेकिन समाज में युवाओं को दी जाने वाली महत्ता के कारण लोग अपनी उम्र छुपाकर रखना पसंद करते हैं।
असल में समाज द्वारा बनाई गई टाइमलाइन तथा बढ़ती उम्र के बारे में लोगों की सोच के कारण हमने हमेशा बढ़ती उम्र के नकारात्मक पक्ष को देखा है। बढ़ती उम्र को ढेर सारी उलझन, मेहनत और लगन की कमी, सक्रियता की कमी जैसी सोच के साथ देखा जाता है। जिसके कारण हमारे भीतर अक्सर उम्र छुपाने की प्रवृत्ति का विकास हो जाता है। किंतु हमने कभी उम्र के सकारात्मक पक्ष की ओर ध्यान देने का प्रयास ही नहीं किया। बढ़ती उम्र हमें परिपक्वता, सूझबूझ तथा स्थिरता प्रदान करती है। और वास्तविकता तो यह है कि 40-50 वर्ष का व्यक्ति किसी कार्य को अपेक्षाकृत अधिक सुदृढ़ता, परिपक्वता और स्थिरता के साथ करने की क्षमता रखता है।
उम्र के सकारात्मक पक्ष को देखते हुए हमें समाज से ही नहीं बल्कि अपने आप से भी यह प्रश्न अवश्य करना चाहिए कि अपनी उम्र से भागना, अपने आप से भागने के समान है या नहीं? अपनी उम्र को अस्वीकार करते हुए कहीं हम अपनी सहजता और स्थिरता की उपेक्षा तो नहीं कर रहे?
— रचना मिश्रा पांडे












