लेखक -— रचना मिश्रा पांडे
दुष्कर्मी बेटा, दोराहे पर मां
पता नहीं उस दुष्कर्मी की मनोदशा क्या होती होगी, कि मात्र क्षणिक सुख के लिए वह अपनी राह से ऐसे भटक जाता है, जहां से वापसी की कोई उम्मीद नहीं होती। बलात्कार एक ऐसा अपराध है, जिसका दंड अकेला अपराधी नहीं भुगतता। उसका दंड भुगतती है पीड़िता, और पीड़िता का पूरा परिवार जिनकी स्थिति को समझने तथा उनके दुख का अनुमान लगाना कठिन नहीं। जिन्हें समाज की पूरी सहानुभूति और सहयोग प्राप्त होता है, जो कि बिल्कुल सही है।
लेकिन इन सब के बीच बड़ी दयनीय स्थिति दोराहे पर खड़ी उस मां की होती है, जो कई अनकही तथा अनसुलझी बातों से मन ही मन जूझ रही होती है। जो बार-बार अपनी कोख को कोसती हुई अपने आप से प्रश्न करती है कि— "क्या सचमुच उसने एक कपूत को जन्म दिया है? क्या आने वाले समय में वह एक दुष्कर्मी की मां कहलाएगी?"
ऐसी ही एक मां के घर दुष्कर्मी के बारे में अधिक जानकारी के लिए एक मीडिया कर्मी पहुंचे। मां बहुत घबराई हुई तथा तनाव में थी। बातचीत के क्रम में उन्होंने बताया कि— "दुष्कर्मी की पांच बहनें और 12 भांजियां हैं। पता नहीं इतनी बहनों तथा भांजियों के होते हुए भी उसने यह सब कैसे कर लिया।" यहां तक कि मां ने पीड़िता की मां के प्रति संवेदनशीलता भी जताई कि— "उस मां पर क्या बीत रही होगी जिसने अपनी बच्ची को खो दिया।"
लेकिन समय के साथ-साथ मां इतनी घबराई हुई नहीं रह गई, उनकी बातचीत में भी वह ईमानदारी नहीं रह गई। अगली बार जब मीडिया कर्मी उनसे बातचीत करने पहुंचे तो मां ने कहा— "मेरा बेटा तो महिलाओं का बहुत सम्मान करता है, वह ऐसा कर ही नहीं सकता। उसे किसी ने फंसा दिया है।" इस बार मां अपने बेटे का पक्ष लेते हुए उसे बचाने का प्रयास कर रही थी, जो कि गलत था।
लेकिन प्रश्न यह उठता है, कि एक मां इस बात को कैसे स्वीकार कर सकती है कि वह एक दुष्कर्मी की मां है। स्थिति पर ध्यान दें, तो स्पष्ट होता है कि मां दो प्रकार के भय से जूझ रही होती है: एक तो अब उसका भरण-पोषण कौन करेगा, दूसरा उस परिवार को उपेक्षा तथा उलाहना का सामना करना पड़ेगा तथा कोई उनसे संबंध नहीं रखना चाहेगा। दूसरी ओर हमारे समाज में कुछ लोगों की सोच ऐसी होती है कि— "यदि दुष्कर्मी की मां-बहन के साथ ऐसा हो तब उसे पता चलेगा कि पीड़िता के परिवार पर क्या बीत रही होगी?" ऐसी सोच गलत है और निंदनीय है। एक महिला के अपमान की आग को दूसरी महिला के अपमान से नहीं बुझाया जा सकता। ऐसी विकृत सोच हमारे समाज के लिए भयावह है।
इन्हीं परिस्थितियों के बीच समाज तथा दुष्कर्मी के परिवार के पारस्परिक सामंजस्य में परिपक्वता की आवश्यकता है। यहाँ हमें समझना होगा कि दुष्कर्मी का परिवार अलग सदमे में है, उनका बेटा दुनिया में होते हुए भी अब उनके बीच नहीं है। समाज में एक अलगाव जैसी स्थिति में रहते हुए, दुष्कर्मी का परिवार एक ऐसे अपराध का दंड भुगत रहा है जो उन्होंने किया ही नहीं। यही वह भय है, जहां दुष्कर्मी के परिवार वाले पहले अपराध छुपाने तथा अपराधी को बचाने का अथक प्रयास करते हैं।
विचारणीय बात यह है कि इन विभिन्न परिस्थितियों को देखते हुए यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका तथा यूनाइटेड किंगडम जैसे विकसित देशों में एक सहयोग प्रणाली मौजूद है, जो अपराधी के परिवार को भावनात्मक और सामाजिक सहयोग प्रदान करती है। यहां अपराधी को सही नहीं ठहराया जाता, न ही अपराध को छुपाने का प्रयास किया जाता है, बल्कि इनका कार्य अपराधी के परिवार के मानसिक स्वास्थ्य पर काम करना होता है। उन्हें पश्चाताप तथा शर्म से बाहर निकालकर अपने आप को बंद कर लेने की प्रवृत्ति से भी बाहर निकालना होता है। उनकी मानसिकता को सही दिशा में प्रेरित किया जाता है ताकि वे अपराध को छुपाने जैसा कार्य करके न्याय में बाधा न बनें।
क्या हमारे देश में भी ऐसे सहयोग संगठन का विकास नहीं होना चाहिए, जहां यह सोच विकसित हो सके कि अपराधी की गलती केवल उसकी गलती है, न कि उसके परिवार की? ताकि उसका परिवार टूट कर अपराध छुपाने जैसा गलत कदम न उठाए। जहां सजा और सामाजिक बहिष्कार के स्थान पर अपराधी के परिवार को भावनात्मक सहयोग देकर उनकी मानसिकता को सही दिशा में ले जाने का प्रयास किया जाए।
अंत में दुष्कर्मी के परिवार को भी क्रमशः अपने दायित्वों को समझना होगा। अपराधी को बचाने का प्रयास न केवल अपने देश और समाज के प्रति अपने दायित्वों से पीछे हटना है, बल्कि फिर से किसी नए अपराध को पनपने में सहयोग देना है। उन्हें समझना होगा कि पीड़िता तथा उसका परिवार अभी गहरे सदमे में है। अतः उनके प्रति अपनी संवेदनशीलता दर्शाते हुए पुत्र मोह में न पड़कर न्याय का साथ दें।
अर्थात वह मां, बहन जो ऐसे दोराहे पर आकर खड़ी हो जाएं, तब भी पीड़िता तथा उसके परिवार के प्रति संवेदनशीलता दर्शाते हुए कभी भी मोह में न पड़कर अपराध छुपाने तथा अपराधी को बचाने का प्रयास बिल्कुल न करें।












