लेखक-- रचना मिश्रा पांडे
भारत एक घनी आबादी वाला देश है। यहाँ तक कि जनसंख्या वृद्धि में तो भारत ने चीन को भी पीछे छोड़ दिया है। बढ़ती हुई आबादी हमारे देश की एक महत्वपूर्ण समस्या है। लेकिन विचारणीय बात यह है, कि क्या घनी आबादी सिर्फ एक समस्या है या इसे मानव संसाधन के रूप में भी देख सकते हैं। या फिर मूल समस्या बढ़ती हुई जनसंख्या से अधिक जनसंख्या को मानव संसाधन के रूप में उसका भरपूर प्रयोग ना कर पाना है। यदि देखा जाए तो भारत मानव संसाधन का धनी होते हुए भी इसका उचित प्रयोग नहीं कर पा रहा है। यदि इस समस्या के मूल में जाएँ तो मुख्य रूप से तीन कारण सामने आते हैं--
पहला कारण:- आर्थिक रूप से महिलाओं की दूसरों पर निर्भरता-
आर्थिक रूप से महिलाओं की पुरुष वर्ग पर निर्भरता भारत में एक आम बात है। सामान्यतः सभ्यता-संस्कृति और परंपरा के नाम पर महिलाओं को अधिकांश घर में बिठा दिया जाता है। पढ़ी-लिखी महिलाएं जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना चाहती हैं, उनमें से भी अधिकांश महिलाओं के लिए घर और दफ्तर की दोहरी जिम्मेदारी उठाना इतना आसान नहीं होता, अतः वह भी घर पर रहकर घर के विभिन्न दायित्वों को पूरा करने के लिए विवश हो जाती हैं।
स्पष्ट है कि सभ्यता-संस्कृति तथा सामाजिक सोच के नाम पर एक बड़ी आबादी की सहभागिता देश के विकास में बहुत कम हो पाती है। हमारे देश की सोच ऐसी है कि "घर का काम महिलाओं की जिम्मेदारी"। इस सोच के स्थान पर यदि ऐसी मानसिकता हो कि "घर सबका है तो दायित्व भी सबका है" और पुरुष वर्ग भी घर के कार्यों में थोड़ा सहयोग करें तो महिलाओं के समय की बचत होगी और वो घर से बाहर निकल कर देश के विकास में सहयोग कर पाएंगी।
धीरे-धीरे मानसिकता बदल भी रही है, लोग महिलाओं को पूर्णतः घर में बिठाने को सही नहीं मान रहे, तथा पुरुष वर्ग भी घर के कामों में सहयोग देने लगे हैं। लेकिन ऐसी मानसिकता की गति बहुत धीमी है। यह हम जितना जल्दी समझ जाएँ कि "महिलाओं को घर बिठाना न सिर्फ उनकी क्षमताओं का हनन है, बल्कि एक बड़ी संख्या में मानव संसाधन की उपेक्षा भी है" उतना अच्छा होगा।
दूसरा कारण:- पुनः कौशल प्रशिक्षण तथा अवसर की कमी-
भारत में मानव संसाधन की बर्बादी का दूसरा मुख्य कारण है पुनः कौशल प्रशिक्षण तथा अवसर की कमी-
भारत में ऐसी संस्थाओं के विकास की काफी आवश्यकता है जो 35, 40 या उससे अधिक उम्र के लोगों को पुनः प्रशिक्षित करके योग्यता अनुसार कार्य दे सकें। भारत में उम्र एक बड़ा कारक है, यहाँ युवाओं को अधिक सक्षम मानकर युवा शक्ति को अधिक महत्व दिया जाता है, तथा 35, 40 या अधिक उम्र के लोगों को कम आँका जाता है। किसी वजह से यदि कोई व्यक्ति आर्थिक रूप से सक्षम ना हो पाया, या फिर उसका कार्य लंबे समय तक छूट गया तो उसके लिए स्वयं को पुनः स्थापित करना बहुत कठिन हो जाता है। और यह भी मानव संसाधन के व्यर्थ होने का बहुत बड़ा कारण है।
इसलिए हमारे देश में उन संस्थाओं के विकास की बहुत आवश्यकता है, जो 35, 40 या उससे अधिक उम्र के लोगों को पुनः कौशल प्रशिक्षण देकर योग्यतानुसार उन्हें कार्य दे सकें। अधिकांश देखा जाता है कि 40 या उससे अधिक उम्र के लोग किसी कार्य को अधिक परिपक्वता के साथ कर पाते हैं। ऐसे में उन्हें कम आँककर उनकी क्षमता का तिरस्कार करना कहां तक उचित है?
तीसरा कारण:- सरकारी नौकरी को अधिक महत्व देना-
भारत में सरकारी नौकरी को लेकर एक गहरी मानसिकता यह है कि सरकारी नौकरी यानी सुरक्षित, स्थाई, तथा स्तरीय जीवन शैली जो सही भी है। लेकिन समस्या यह है कि एक बड़ी संख्या में परीक्षार्थी सरकारी नौकरी की तैयारी करते हैं, और एक सरकारी नौकरी की आस में लोग कई सालों तक इसकी तैयारी में लगे रहते हैं, और आर्थिक रूप से अपने अभिभावकों पर निर्भर करते हैं। अर्थात् युवा होने के बावजूद अपने देश में उनकी कोई आर्थिक सहभागिता नहीं होती।
हालांकि सरकारी नौकरी के लिए जो परीक्षाएं होती हैं उसका उद्देश्य होता है, सबसे उपयुक्त उम्मीदवार चुनना। लेकिन चयन की प्रक्रिया इतनी जटिल होती है, कि इसमें बहुत कम लोग चयनित हो पाते हैं। और कठिन परिश्रम के बाद भी जिन लोगों का चयन नहीं हो पाता, उन्हें सिर्फ असफलता का एहसास नहीं तोड़ता बल्कि समय की बर्बादी भी भीतर ही भीतर खोखला कर देती है, कि जितना समय उन्होंने सरकारी नौकरी की तैयारी में लगा दिया, उतने समय में कोई बिज़नस खड़ा कर सकते थे। या फिर किसी अन्य कौशल को सीखकर किसी प्राइवेट नौकरी में आगे बढ़ सकते थे। अर्थात् कुछ और करके आर्थिक रूप से संबल हो सकते थे। लेकिन सरकारी नौकरी की आस में उनका बहुत सारा समय बर्बाद हो गया।
दूसरी ओर विचारणीय यह है कि यदि किसी उम्मीदवार ने प्रारंभिक परीक्षा उत्तीर्ण कर ली हो लेकिन वह मुख्य परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो पाया या फिर कोई मुख्य परीक्षा में उत्तीर्ण होता है, लेकिन साक्षात्कार में अनुत्तीर्ण हो जाता है तो ऐसी स्थिति में एक बात तो निश्चित है कि ऐसे उम्मीदवारों में कुछ क्षमता तो अवश्य होगी। ऐसे में उन्हें फिर से अगली बार के लिए बिठा देना क्या उनकी क्षमता तथा मानव संसाधन दोनों का अनादर करना नहीं है? ऐसी स्थिति में अच्छा होता यदि कांट्रैक्ट बेसिस पर ही सही किंतु नौकरियों का प्रबंध हो सकता, इससे परीक्षार्थी का मनोबल पूर्णतः नहीं टूटता और मानव संसाधन की बर्बादी भी नहीं होती।
वैश्विक और क्षेत्रीय परिप्रेक्ष्य
हम देखते हैं कि चीन और भारत दोनों एक बड़ी जनसंख्या वाले देश हैं। किंतु चीन अपनी जनसंख्या को जहाँ मानव संसाधन के रूप में देखता है, वहीं भारत में बड़ी जनसंख्या एक समस्या का कारण बनी हुई है। एक समय में चीन आर्थिक रूप से एक कमजोर देश था। 1980 के दशक से चीन अपने आर्थिक विकास की ओर काफी तेजी से कदम बढ़ा रहा है, आज चीन एक संपन्न देश है। जिसका प्रमुख कारण चीन द्वारा अपनी जनसंख्या को मानव संसाधन के रूप में देखना है। चीन अपने उपयोग की हर छोटी-बड़ी वस्तु का निर्माण स्वयं करता है। जिससे उद्योग धंधों का विकास काफी तेजी से होता है, तथा मानव संसाधन का अधिकाधिक प्रयोग होता है, और अपने देश की पूंजी अपने देश में ही घूमती रहती है।
हमारे देश में भी हर राज्य की अपनी विशेषता है जैसे:
- झारखंड में खनिज संपदा भरपूर मात्रा में है।
- बिहार तथा पंजाब दोनों कृषि प्रधान राज्य हैं, यहाँ फल, दूध, अनाज तथा सब्जियां प्रचुर मात्रा में होती हैं।
- उड़ीसा में कृषि उत्पादन तथा खनिज संपदा दोनों प्रचुर मात्रा में हैं।
यदि हर राज्य अपनी विशेषता के अनुसार उद्योग धंधों के विकास पर तेजी से कार्य करे तो हर राज्य अपने आप में आर्थिक संबल होगा, साथ ही हमारे देश में भी मानव संसाधन का प्रचुर मात्रा में प्रयोग होगा।
निष्कर्ष
स्पष्ट है कि हमारे देश में बड़ी जनसंख्या इतनी बड़ी समस्या नहीं है, जितनी कि अपनी जनसंख्या को प्रचुर मात्रा में मानव संसाधन के रूप में प्रयोग ना कर पाना है।
लेखक-- रचना मिश्रा पांडे











