लेखक - — रचना मिश्रा पांडे
यदि हम भाषा की परिभाषा पर ध्यान दे, तो हम देखते हैं कि "भाषा वह साधन है ,जिसके द्वारा हम अपने भावों और विचारों को एक- दूसरे से आदान-प्रदान कर सकते हैं।" अर्थात भाषा चाहे कोई भी हो उसका कार्य एक ही है ,अपने भावों और विचारों को परस्पर साझा करना। तो क्या किसी विशेष भाषा को बोलकर हम अन्य भाषा बोलने वालों से श्रेष्ठ हो सकते हैं?
बचपन में एक घटना बराबर हमारे साथ घटती थी, जिसे हम अपनी हीनता और अपमान समझकर किसी से चर्चा करना उचित नहीं समझते थे ।अक्सर ऐसा होता था, कि अंग्रेजी माध्यम के बच्चे हमें देखकर ज़ोर-ज़ोर से अंग्रेजी में बातें करने लगते थे। ऐसा लगता था कि वो हमें नज़रअंदाज कर रहे हैं, किंतु असल में वह हमें देखकर ही अंग्रेजी में बोलना शुरू करते थे ।ऐसा नहीं था कि हमें अंग्रेजी पढ़ने या समझने में कोई परेशानी थी, किंतु इनकी तरह धारा प्रवाह, बेझिझक हम बोल नहीं पाते थे ।अंग्रेजी माध्यम विद्यालय के शुल्क अधिक थे, इसलिए संपन्न परिवार के बच्चे ही उन विद्यालयों में प्रवेश कर पाते थे। और हम मध्यम वर्गीय परिवार के बच्चे बजाय परिस्थिति को समझने के अपने आप में एक हीनता का अनुभव करते थे।
लेकिन सवाल यह उठता है ,कि क्या अंग्रेजी में बात करके सचमुच वो हमसे श्रेष्ठ हो जाते थे ?या हिंदी में बात करके हमें हीनता का अनुभव होना चाहिए था? यह प्रश्न मेरे मन में आज भी उठते हैं।
वह 90 का दशक था तब से लेकर आज तक बहुत कुछ बदल गया, नहीं बदला तो सिर्फ हमारे मन- मस्तिष्क पर अंग्रेजी का दबदबा।
हममें से अधिकांश लोगों के मन में यह प्रश्न अवश्य उठते होंगे, कि कब और कैसे अंग्रेजी पर हमारी निर्भरता इतनी बढ़ती चली गई कि अंग्रेजी कम जानना या ना जानना हमें अपने ही देश में असहज बनाने लगा ,यहां तक कि एक तरह से कमजोरी का परिचायक बन गया ?और क्या हम अंग्रेजी पर निर्भरता को कुछ कम कर सकते हैं? और यदि हां तो कैसे? जब रूस, जापान ,चीन जैसे विकसित देश अपनी भाषा को लेकर आगे बढ़ सकते हैं, तो भारत अपनी भाषा को लेकर आगे क्यों नहीं बढ़ सकता?

भारत में अंग्रेजी पर निर्भरता की बात करें तो मुख्य रूप से चार कारण सामने आते हैं--
- क. ऐतिहासिक कारण-- हमारा देश लगभग 200 सालों तक ब्रिटिश शासन का गुलाम रहा। ऐसे में उन्हें भारत से भी ऐसे लोगों की आवश्यकता थी जो उनके अधीन होकर उनके लिए काम कर सके ।जो उनकी भाषा समझे बिना संभव नहीं था। अतः उन्होंने उच्च शिक्षा का माध्यम ही अंग्रेजी कर दिया। कालेज तथा सरकारी नौकरियों में अंग्रेजी का महत्व बढ़ा दिया। जहां हमारी भाषा संस्कृत, हिंदी ,फारसी दब गई। और भारत की शिक्षा प्रणाली धीरे-धीरे अंग्रेजी केंद्रित हो गई ।हम आज तक इसी शिक्षा प्रणाली को ढोते चले आ रहे हैं ।कई लोक सेवा आयोग की तैयारी करवाने वाले शिक्षकों ने भी पठन-पाठन के क्रम में इस बात की चर्चा की है कि बच्चों के लिए शिक्षा ग्रहण करना इतना कठिन नहीं होता यदि हमारी भाषा हमसे ना छीनी गई होती ।अंग्रेजों के समय से ही हमारी मनोदशा ऐसी बन गई कि, अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान मतलब अपेक्षाकृत अधिक सभ्य, शिक्षित ,और श्रेष्ठ।
- ख. सामाजिक कारण-- आज भी हमारी शिक्षा -प्रणाली अंग्रेजी केंद्रित है ।अतः आज भी हमारे समाज में उन लोगों को श्रेष्ठ और अपेक्षाकृत अधिक पढ़ा- लिखा और सभ्य समझा जाता है, जिनकी अंग्रेजी बहुत अच्छी हो या जो धारा प्रवाह अंग्रेजी बोल सकते हों ।अंग्रेज तो चले गए लेकिन अंग्रेजी के प्रति हमारी मानसिकता नहीं बदली। आज भी उच्च स्तरीय विद्यालय जहां अच्छी शिक्षा, विभिन्न सुविधाएं, उच्च कोटि के शिक्षक ,सब कुछ उपलब्ध होते हैं, उनके माध्यम अंग्रेजी ही होते हैं।यहां तक कि कुछ विद्यालय तो ऐसे हैं जहां हिंदी बोलने पर बच्चों को दंडित किया जाता है। स्कूल के कैंपस में पहुंचते ही बच्चों को अंग्रेजी में ही बात करना है, यही नियम रखा जाता है। जो कि बिल्कुल गलत है जहां अपनी मातृभाषा बोलने पर दंडित किया जाए, वहां स्वतः अंग्रेजी को श्रेष्ठ बनाकर मातृभाषा को अपमानित कर दिया गया ।ऐसे में बच्चों की मानसिकता भी ऐसी बनती है, कि अंग्रेजी बोलकर वह औरों से श्रेष्ठ हो जाते हैं ।और क्योंकि हिंदी बोलना मतलब दंड का भागी होना ,तो अपनी मातृभाषा बोलने को कमतर होने का परिचायक मानते हैं। जब यहां की शिक्षा दीक्षा ही अंग्रेजी केंद्रित है तो स्वतः अंग्रेजी पर निर्भरता बढ़ जाती।
- ग. संपर्क भाषा-- भारत एक बहुभाषी देश है। भारत के भीतर ही यदि दक्षिण भारत को देखा जाए, तो उनका विकास एक अलग भाषा में होता है। अपनी भाषा के अलावा वह अंग्रेजी भाषा की अच्छी समझ रखते हैं। दक्षिण भारत के लोग हिंदी बहुत कम जानते हैं, या फिर नहीं जानते हैं ।ऐसी स्थिति में विदेश के अलावा अपने देश में भी अंग्रेजी एक संपर्क भाषा के रूप में काम करती है ।अतः यहां भी अंग्रेजी पर निर्भरता आ जाती है।
- घ. अवसर की अधिकता-- आईटी, विज्ञान, चिकित्सा, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और इंटरनेट का एक बड़ा हिस्सा अंग्रेजी में ही उपलब्ध है। अतः अंग्रेजी जानने वालों को अवसर अधिक मिलते हैं।
उपर्युक्त कारणों से आज भी हमारी अंग्रेजी पर निर्भरता बनी हुई है। कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं, जिससे हमारी अंग्रेजी के प्रति निर्भरता कुछ कम हो सके--
- क. उच्च शिक्षा की गुणवत्ता वाली किताबें हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में भी उपलब्ध हो सके।
- ख. विज्ञान, तकनीक और कानून की उच्च गुणवत्ता पूर्ण किताबें भारतीय भाषा में भी उपलब्ध हो।
यदि हमें अपनी भाषा में उच्च गुणवत्ता वाली पुस्तक उपलब्ध कराई जाएंगी तो हमारी शिक्षा दीक्षा भी अपनी भाषा में संभव हो पाएगी ।और हमें काम भी जानकारी के आधार पर प्राप्त होगा ,ना कि अंग्रेजी के आधार पर ऐसे में हमें कम से कम अपने देश में रहने के लिए अंग्रेजी का मोहताज नहीं होना पड़ेगा।
और सबसे बढ़कर काम हमें अपनी मानसिकता पर करना होगा, जहां हमें समझना होगा की मात्र अंग्रेजी जानना अच्छी शिक्षा का परिचायक बिल्कुल भी नहीं है। वास्तविकता तो यह है की भाषा और बुद्धि दो अलग-अलग चीजें हैं ,कोई व्यक्ति उत्कृष्ट वैज्ञानिक ,लेखक, गणितज्ञ कलाकार कुछ भी हो सकता है भले ही उसे अंग्रेजी ना आती हो।
साथ ही हमें अंग्रेजी को एक कौशल के रूप में देखना चाहिए ,अंग्रेजी का ज्ञान हमें अवसर प्रदान करता है। अंग्रेजी एक संपर्क भाषा है अतः इसे सीखना हमें एक कौशल प्रदान करता है ।लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है, कि हम अंग्रेजी बोलकर अपेक्षाकृत अधिक शिक्षित और सभ्य हो जाते हैं ,तथा हिंदी या अन्य भारतीय भाषा बोलकर हमें अपने आप में हीनता या असहजता का एहसास होना चाहिए।
विचारणीय है कि हर भाषा का कार्य तो एक ही होता है। हर भाषा अपने आप में इतनी महान् है कि यह हमें हमारे भावों और विचारों को परस्पर साझा करने का सहारा बनती है। तो किसी भी विशेष भाषा को बोलकर हम श्रेष्ठ और किसी अन्य भाषा को बोलकर हम कमतर कैसे आंके जा सकते हैं?
लेखक - — रचना मिश्रा पांडे








