अगर आपने कभी किसी चीज़ की लंबी EMI भरी हो, तो आप जानते होंगे कि आखिरी किस्त चुकाने के बाद सबसे बड़ी उम्मीद क्या होती है—अब खर्च थोड़ा कम होगा और जेब में राहत मिलेगी। देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर आज ठीक ऐसा ही माहौल है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में साफ कहा है कि पिछली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के समय जारी किए गए ऑयल बॉन्ड का पूरा बोझ अब खत्म हो चुका है। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी भी पहले कई बार यह कह चुके हैं कि इन्हीं बॉन्ड्स की वजह से सरकार के लिए पेट्रोल-डीजल सस्ता करना आसान नहीं था।
लेकिन अब जब यह कर्ज खत्म हो गया है, तो आम आदमी के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या अब पेट्रोल-डीजल सस्ता होगा?
असल में, ऑयल बॉन्ड कोई छोटी रकम नहीं थी। 2004 से 2010 के बीच जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बहुत ज्यादा थीं, तब सरकार ने जनता को राहत देने के लिए सीधे सब्सिडी देने की बजाय बॉन्ड जारी किए। यह एक तरह का उधार था, जिसे बाद की सरकारों को ब्याज सहित चुकाना था। कुल मिलाकर यह बोझ बढ़ते-बढ़ते करीब 2.92 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जिसे अब सरकार के अनुसार पूरी तरह चुका दिया गया है।
यहां तक तो कहानी सीधी लगती है, लेकिन असली सवाल इसके बाद शुरू होता है। पिछले कुछ सालों में सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर टैक्स से भारी कमाई की है। 2014 से 2023 के बीच यह आंकड़ा करीब 20 से 25 लाख करोड़ रुपये तक बताया जाता है। यानी जितना कर्ज था, उससे कई गुना ज्यादा राजस्व सरकार को तेल से मिलता रहा।
यही वजह है कि कई विशेषज्ञ यह मानते हैं कि सिर्फ ऑयल बॉन्ड ही कीमतें ज्यादा होने की वजह नहीं थे। सच्चाई यह है कि पेट्रोल-डीजल सरकार के लिए कमाई का एक बड़ा और स्थिर जरिया बन चुका है।
अब सवाल फिर वही—क्या आम आदमी को राहत मिलेगी?
जवाब थोड़ा निराश करने वाला हो सकता है। कीमतें सिर्फ एक कारण से तय नहीं होतीं। भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर कच्चा तेल बाहर से खरीदता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ते ही इसका असर यहां दिखता है। इसके अलावा डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति भी कीमत तय करती है। सबसे बड़ा फैक्टर टैक्स होता है, जो कई बार कुल कीमत का लगभग आधा हिस्सा होता है।
फिलहाल कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास चल रही हैं, जो सरकार के लिए कीमतें कम करने की गुंजाइश को सीमित करती हैं। ऐसे में तुरंत बड़ी राहत की उम्मीद करना मुश्किल है।
कुल मिलाकर तस्वीर यह है कि ऑयल बॉन्ड का अध्याय भले ही बंद हो गया हो, लेकिन पेट्रोल-डीजल की कीमतों में राहत का रास्ता अभी भी कई आर्थिक और नीतिगत कारणों से जुड़ा हुआ है। आम आदमी के लिए इसका मतलब यही है कि फिलहाल जेब पर बोझ कम होने की उम्मीद थोड़ी और लंबी खिंच सकती है।











