(अभिषेक राजवंशी, संवाददाता, रांची)
रांची – किसी भी आंदोलन की शुरुआत तो एक अच्छे मुद्दे के साथ होती है। लेकिन ज्यों ज्यों आंदोलन आगे बढ़ता है, वैसे ही विभिन्न विपक्षी पार्टियां इन आंदोलनों में घुस आती हैं और अपनी रोटियां सेकनी शुरू कर देती हैं या कहें आंदोलन को हाईजैक कर लिया जाता है। बेचारे छात्र भी मुद्दे से भटक कर इन विपक्षी दलों की चाल में फंस कर रह जाते है। विपक्षी पार्टियां जो चाहती है, वह करने लगती है। वहीं राजनीति से दूर भोले भाले छात्र उनके झांसे में आ जाते हैं और समझ नहीं पाते आखिर उनका भला कौन चाह रहा है। बात हम झारखंड की राजधानी रांची में चल रहे छात्र आंदोलन की कर रहे हैं।
यहां भी छात्रों ने हेमंत सरकार से सामने अपनी कुछ मांगे रखी। छात्रों की जो भी जायज मांगे थी, सभी को मान लिया गया। इस मामले में राज्य सरकार की जांच एजेंसी सीआईडी काफी बेहतर ढंग से काम कर रही है, उसके परिणाम भी काफी सकारात्मक आए हैं। कई गिरफ्तारियां भी हो चुकी है और जांच जारी है।
वहीं पूर्व की बात करें तो वर्ष 2000 में राज्य गठन के बाद आयोजित की गई पहली और दूसरी जेपीएससी संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा में भाई-भतीजावाद, अंकों की हेराफेरी और भारी भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। हाईकोर्ट के आदेश के बाद इस पूरे मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई थी। सीबीआई ने इस मामले में गहन जांच करते हुए जेपीएससी के तत्कालीन अध्यक्ष, सदस्यों और कई अधिकारियों के खिलाफ चार्जशीट और सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की थी। भ्रष्टाचार के आरोपी कई अधिकारियों को जेल भी जाना पड़ा था और यह मामला अभी भी अदालतों में लंबित है।
वर्तमान राज्य सरकार छात्रों के हित में ही काम करना चाहती है। सरकार का कहना है कि राज्य की सीआईडी और सख्त 'एंटी-पेपर लीक कानून' के तहत त्वरित कार्रवाई की जा रही है। वहीं सीबीआई जांच सौंपने से प्रक्रिया बहुत लंबी खिंच जाती है, जिससे नियुक्तियां सालों-साल रुकी रह सकती हैं। छात्र यह नहीं समझ पा रहे हैं, सीबीआई को जांच सौपने पर उसका खामियाजा उन्हें ही भुगतना पड़ेगा।








