(प्रमोद खंडेलवाल, संवाददाता, हजारीबाग)
हजारीबाग - कुछ कहानियां किताबों में नहीं मिलतीं, वे मिट्टी की खुशबू में सांस लेती हैं। कुछ इतिहास पत्थरों पर नहीं, बल्कि दीवारों पर उकेरे जाते हैं और कुछ विरासतें ऐसी होती हैं, जिन्हें सदियों से महिलाएं अपनी उंगलियों की लकीरों से जीवित रखे हुए हैं। यह कहानी है झारखंड की हजारों साल पुरानी सोहराई और खोवर कला की। जो आज गांव की मिट्टी से निकलकर पूरी दुनिया की दीवारों तक पहुंच चुकी है।
साल 1991 में हजारीबाग के बड़कागांव के पास इस्को की गुफाओं में मिले हजारों साल पुराने शैलचित्रों ने इतिहास की दिशा बदल दी। जब इन चित्रों का अध्ययन किया गया, तो विशेषज्ञों ने महसूस किया कि आज की सोहराई कला और उन प्राचीन शैलचित्रों में अद्भुत समानता है। यहीं से यह विश्वास और मजबूत हुआ कि यह परंपरा लगभग दस हजार वर्षों से लगातार जीवित है।
गौरतलब हो कि इस विरासत को गांव की चौखट से निकालकर दुनिया के मंच तक पहुंचाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है पद्मश्री बुलु इमाम ने। उन्होंने ना केवल इस कला का अध्ययन किया, बल्कि इसे देश-विदेश की प्रदर्शनियों तक पहुंचाने का भी काम किया है।








