रांची: झारखंड के राजस्व इतिहास में वित्तीय वर्ष 2025-26 एक मील का पत्थर साबित हुआ है। राज्य सरकार ने इस वर्ष शराब की बिक्री से ऐतिहासिक आय अर्जित की है, जो न केवल उम्मीदों से बेहतर है बल्कि पहली बार तय लक्ष्य के आंकड़े को भी पार कर गई है। सरकार ने इस वित्तीय वर्ष के लिए 3585.24 करोड़ रुपये का राजस्व लक्ष्य निर्धारित किया था, जिसके मुकाबले वास्तविक प्राप्ति 4044.41 करोड़ रुपये रही। यह उपलब्धि लक्ष्य का कुल 112.80 प्रतिशत है और राज्य गठन के बाद यह पहला अवसर है जब शराब से मिलने वाला राजस्व अपने निर्धारित लक्ष्य से ऊपर गया है।
इस रिकॉर्ड तोड़ कमाई के पीछे सरकार द्वारा उत्पाद नीति में किए गए रणनीतिक बदलावों को मुख्य कारण माना जा रहा है। गौरतलब है कि राजस्व बढ़ाने के उद्देश्य से राज्य सरकार ने समय-समय पर कई प्रयोग किए, जिनमें झारखंड बिवरेज कॉरपोरेशन का गठन और छत्तीसगढ़ मॉडल को अपनाना शामिल था। वर्ष 2022 में लागू की गई नीति के तहत सरकार ने खुदरा बिक्री का जिम्मा खुद संभाला था, लेकिन वह प्रयोग सफल नहीं रहा और राजस्व में गिरावट दर्ज की गई। इसके अलावा, 2022 की नीति भारी विवादों और घोटालों के आरोपों से भी घिरी रही, जिसके चलते तत्कालीन उत्पाद सचिव विनय चौबे सहित कई अधिकारियों को कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ा।
विवादों और घटते राजस्व से सबक लेते हुए सरकार ने वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए एक नई उत्पाद नीति तैयार की। इस नीति का सबसे महत्वपूर्ण बदलाव शराब की खुदरा बिक्री को फिर से निजी हाथों में सौंपना था। इसके साथ ही सरकार ने दुकानों की संख्या को भी युक्तिसंगत बनाते हुए 1453 से घटाकर 1230 कर दिया। यह नई व्यवस्था सितंबर 2025 से लागू हुई, जबकि इससे पहले के पांच महीने पुरानी नीति के तहत काम चला। नई नीति के प्रभावी क्रियान्वयन और निजी क्षेत्र की भागीदारी का ही परिणाम रहा कि सरकार ने 3558.23 करोड़ रुपये के संशोधित लक्ष्य को पीछे छोड़ते हुए 4044.41 करोड़ रुपये का खजाना भर लिया।
राजस्व के आंकड़ों का विस्तार से विश्लेषण करें तो पता चलता है कि कमाई का सबसे बड़ा हिस्सा एक्साइज ट्रांसपोर्ट ड्यूटी से आया, जो 3456.72 करोड़ रुपये रहा। इसके अतिरिक्त एक्साइज ड्यूटी से 404.32 करोड़ रुपये, एडिशनल एक्साइज ड्यूटी से 81.28 करोड़ रुपये और लाइसेंस फीस से 42.57 करोड़ रुपये प्राप्त हुए। लॉटरी फीस और बार लाइसेंस फीस ने भी क्रमशः 24.15 करोड़ और 35.35 करोड़ रुपये का योगदान दिया।
बेहतर प्रबंधन और निजी हाथों में बाजार की वापसी ने राजस्व के इस ट्रेंड को सकारात्मक दिशा दी है। हालांकि, यह सफलता एक पुरानी बहस को भी जन्म देती है कि क्या केवल राजस्व में वृद्धि को ही सरकारी सफलता का पैमाना माना जाना चाहिए, या फिर शराब की बढ़ती खपत से होने वाले सामाजिक प्रभावों पर भी विचार आवश्यक है। फिलहाल, इन आंकड़ों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सही नीतिगत बदलाव और नियंत्रित प्रबंधन के जरिए झारखंड सरकार ने अपनी वित्तीय स्थिति को मजबूती प्रदान की है। अब भविष्य में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सरकार इसी मॉडल को बरकरार रखती है या सामाजिक दबाव के बीच इसमें फिर से कोई बदलाव देखने को मिलता है।











