रांची: भारतीय राजनीति की बिसात पर अब एक नया और बेहद रणनीतिक अध्याय शुरू हो चुका है। झारखंड की लाल माटी से निकली राजनीति अब असम के हरे-भरे चाय बागानों और बंगाल के आदिवासी इलाकों तक अपनी गूँज पहुँचा रही है। इस पूरी हलचल के केंद्र में हैं— हेमंत सोरेन। झारखंड के मुख्यमंत्री के रूप में चार बार शपथ लेने वाले सोरेन अब खुद को केवल एक राज्य के नेता तक सीमित नहीं रखना चाहते। उनकी नजर अब देश की उस 12 करोड़ से ज्यादा की आदिवासी आबादी पर है, जो दशकों से एक सशक्त और साझा राष्ट्रीय नेतृत्व की तलाश में है।
झारखंड की राजधानी रांची की गलियों से शुरू हुई 'दिशोम गुरु' (शिबू सोरेन) की विरासत को अब हेमंत सोरेन ने सात समंदर पार तो नहीं, लेकिन देश की सात बहनों (Seven Sisters) में से एक, असम की वादियों तक पहुंचा दिया है। यह सिर्फ चुनावी सीटों का गणित नहीं है, बल्कि एक सांस्कृतिक सेतु (Cultural Bridge) बनाने की कोशिश है।
असम के चाय बागानों में जब हेमंत सोरेन हाथ में मांदर थामकर उतरते हैं, तो वहां के मजदूरों को उनमें अपना मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि अपना एक 'अंश' नजर आता है। ये वो लोग हैं जिनके पूर्वज सदियों पहले छोटानागपुर की धरती से विस्थापित होकर असम की चाय की पत्तियों में अपना पसीना बहाने चले गए थे। हेमंत सोरेन इसी 'साझा दर्द' और 'साझा विरासत' को अपनी राजनीति का सबसे बड़ा हथियार बना रहे हैं।
क्या हेमंत सोरेन बन रहे हैं आदिवासियों के 'अंबेडकर'?
जिस तरह दलित राजनीति में एक समय मायावती या कांशीराम ने उत्तर भारत की सीमाओं को तोड़कर एक व्यापक पहचान बनाई थी, कुछ वैसा ही प्रयोग हेमंत सोरेन आदिवासी राजनीति में कर रहे हैं।
- अकेले लड़ने का साहस: असम में कांग्रेस जैसे बड़े सहयोगी को किनारे कर 21 सीटों पर अकेले उतरना यह संदेश देता है कि हेमंत अब 'सहयोगी' (Junior Partner) की भूमिका से ऊब चुके हैं। वे खुद को एक 'स्वतंत्र धुरी' के रूप में पेश कर रहे हैं।
- मुद्दों का अंतरराष्ट्रीयकरण: जल, जंगल और जमीन की लड़ाई को सोरेन ने अब 'आदिवासी अस्मिता' और 'संवैधानिक अधिकार' (जैसे सरना धर्म कोड और 1932 का खतियान) से जोड़ दिया है। यह नैरेटिव मध्य प्रदेश के भीलों, राजस्थान के मीणाओं और छत्तीसगढ़ के गोंड आदिवासियों को भी अपनी ओर आकर्षित करने की क्षमता रखता है।

चाय की चुस्कियों में 'अबुआ राज' का स्वाद
असम के डिब्रूगढ़, तिनसुकिया और जोरहाट जैसे इलाकों में रहने वाली 'टी-ट्राइब' आबादी किंगमेकर की भूमिका में होती है। हेमंत सोरेन जानते हैं कि अगर वे यहां के आदिवासियों को यह समझाने में सफल रहे कि "आपकी जड़ें झारखंड में हैं और आपका रक्षक भी वहीं से आएगा", तो यह भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा 'शिफ्ट' होगा।
पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स की मानें तो हेमंत की संवाद शैली में एक 'खामोश आक्रामकता' है। वे शोर कम मचाते हैं, लेकिन जब 'संथाली' या 'हो' भाषा में संवाद करते हैं, तो वह सीधा जनमानस के दिल में उतरता है। यही कारण है कि जेएमएम अब बंगाल के जंगलमहल से लेकर ओडिशा के मयूरभंज तक अपनी इकाइयों को सक्रिय कर रही है।
चुनौतियों का चक्रव्यूह: क्या राह आसान होगी?
बेशक, यह राह फूलों की सेज नहीं है। असम में बीजेपी का मजबूत संगठन और स्थानीय 'असमिया बनाम बाहरी' की राजनीति हेमंत के लिए बड़ी चुनौती है। साथ ही, अलग-अलग राज्यों के आदिवासियों के अपने स्थानीय नायक और अपनी बोलियां हैं। लेकिन हेमंत सोरेन की रणनीति 'विविधता में एकता' वाली है। वे आदिवासियों को यह अहसास करा रहे हैं कि टुकड़ों में बंटकर वे अपनी लड़ाई नहीं जीत सकते; उन्हें एक 'चेहरे' की जरूरत है—और वह चेहरा हेमंत सोरेन खुद बनना चाहते हैं।
एक नए युग का उदय: क्षेत्रीय से राष्ट्रीय की ओर
आने वाले 2026 के असम चुनाव केवल हार-जीत का फैसला नहीं करेंगे, बल्कि यह तय करेंगे कि क्या भारत को अपना पहला 'नेशनल ट्राइबल लीडर' मिल गया है। हेमंत सोरेन की यह 'पॉलिटिकल इंजीनियरिंग' अगर सफल होती है, तो भविष्य में दिल्ली की गद्दी का रास्ता इन आदिवासी बाहुल्य राज्यों की गलियों से होकर गुजरेगा।
झारखंड के 'टाइगर' कहे जाने वाले शिबू सोरेन के बेटे ने अब अपनी दहाड़ दूर तक पहुंचाने का फैसला कर लिया है। अब देखना यह है कि देश का आदिवासी समाज इस आह्वान पर किस तरह अपनी प्रतिक्रिया देता है।











