असम विधानसभा चुनाव के रण में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने आदिवासी अस्मिता और उनके संवैधानिक अधिकारों के मुद्दे को केंद्र में लाकर राजनीतिक माहौल गरमा दिया है। विभिन्न जनसभाओं को संबोधित करते हुए सोरेन ने कहा कि जिस आदिवासी समाज ने अपने कठिन परिश्रम से असम के चाय बागानों को सींचा और राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ तैयार की, वह आज भी बुनियादी हक-हकूक के लिए संघर्ष कर रहा है। उन्होंने इसे महज एक राजनीतिक मुद्दा मानने से इनकार करते हुए इसे पहचान, सम्मान और ऐतिहासिक न्याय की लड़ाई करार दिया।
हेमंत सोरेन ने आदिवासी समाज की वर्तमान स्थिति पर गहरा क्षोभ प्रकट करते हुए कहा कि उन्हें 'टी ट्राइब' जैसे सीमित शब्दों में बांधकर रखना और बराबरी के अधिकारों से वंचित करना, वर्षों से चली आ रही शोषणकारी मानसिकता का परिचायक है। उन्होंने इतिहास के पन्नों को पलटते हुए याद दिलाया कि अंग्रेजों के शासनकाल में आदिवासियों को उनके मूल घरों से दूर लाकर बागानों में काम करने के लिए विवश किया गया था। विडंबना यह है कि आजादी के इतने दशकों बाद भी उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में कोई ठोस बदलाव नहीं आया है, जो हमारे लोकतंत्र की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है।
झामुमो (JMM) नेता ने स्पष्ट संदेश दिया कि अब इतिहास के इन अन्यायों को सुधारने का समय आ गया है और आदिवासी समाज अपनी उपेक्षा पर अब और चुप नहीं रहेगा। उन्होंने विश्वनाथ विधानसभा क्षेत्र में जनसभा के दौरान जनता से सीधा संवाद करते हुए कहा कि उन्हें स्थानीय लोगों का जो अपार स्नेह मिल रहा है, वही उनकी सबसे बड़ी शक्ति है। सोरेन ने मतदाताओं से अपील की कि वे आगामी 9 अप्रैल को एकजुट होकर जेएमएम प्रत्याशी तिहारो गौर के पक्ष में 'तीर-धनुष' चुनाव चिन्ह पर बटन दबाएं और अपने अधिकारों की इस लड़ाई को निर्णायक मोड़ तक पहुँचाएं। अपने संबोधन के अंत में उन्होंने पारंपरिक 'जय जोहार' के नारे और स्थानीय भाषा में संवाद के जरिए लोगों के दिलों को छूने की कोशिश की, जिससे असम के चुनावी मैदान में जेएमएम की दावेदारी और मजबूत होती दिख रही है।











