रिपोर्ट - उमेश कांत गिरि
घाटशिला/बहरागोड़ा: घाटशिला मंडल में भारतीय जनता पार्टी के भीतर उभरते असंतोष ने अब खुलकर विरोध का रूप ले लिया है। मंडल अध्यक्ष के चयन को लेकर संगठन के कई पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने नाराजगी जताते हुए सामूहिक पदत्याग की घोषणा कर दी है। इस पूरे घटनाक्रम ने न केवल संगठनात्मक अनुशासन पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि क्षेत्रीय राजनीति में भी हलचल तेज कर दी है।
मंडल महामंत्री सुखेन दास ने स्पष्ट किया कि उनकी नाराजगी नए अध्यक्ष से नहीं, बल्कि चयन प्रक्रिया से है। उनका कहना है कि संगठन द्वारा पूर्व में यह आश्वासन दिया गया था कि मंडल अध्यक्ष का चयन स्थानीय पदाधिकारियों से विचार-विमर्श के बाद ही किया जाएगा, लेकिन इस बार बिना किसी चर्चा और संगठनात्मक नियमों का पालन किए सीधे नामों की घोषणा कर दी गई। इसी बात से कार्यकर्ताओं में आक्रोश है।

धरमबहाल पंचायत संयोजक विकास पांडा ने भी चयन प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि जिन लोगों को यह जिम्मेदारी दी गई थी, उन्होंने ही पारदर्शिता और नियमों को दरकिनार कर दिया। बिना राय-शुमारी और संवाद के किए गए इस निर्णय से मंडल कमेटी के पदाधिकारी खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।
इसी विरोध के चलते घाटशिला मंडल के कई पदाधिकारियों—जिनमें सुखेन दास, मॉमिता दास, विश्वनाथ भट्टाचार्य, विकास पांडा, नारायण दंडपात, हरप्रीत सिंह, रविरंजन घोष, गणेश सीट, कमल बेरा, रीता राय, सुमित्रा बारिक, अनिता बारिक और कौशल्या बारी शामिल हैं—ने सामूहिक रूप से अपने पद से इस्तीफा देने की घोषणा की है। यह निर्णय सर्कस मैदान के समीप आयोजित एक बैठक में सार्वजनिक रूप से लिया गया, जिसकी लिखित सूचना जिला ग्रामीण अध्यक्ष को भेजी जा रही है।
पार्टी के भीतर बढ़ते इस असंतोष को लेकर कार्यकर्ताओं का मानना है कि यदि समय रहते स्थिति को नियंत्रित नहीं किया गया, तो यह विवाद और गहराता जाएगा और आने वाले चुनावों में पार्टी को नुकसान उठाना पड़ सकता है। चौक-चौराहों पर भी इस बात की चर्चा है कि इसी तरह की अंदरूनी कलह और गुटबाजी के कारण घाटशिला विधानसभा के पूर्व उम्मीदवार बाबूलाल सोरेन को दो बार हार का सामना करना पड़ा था, बावजूद इसके जिम्मेदार पदाधिकारियों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
इस विवाद की चिंगारी अब बहरागोड़ा विधानसभा क्षेत्र के बरसोल तक पहुंचती नजर आ रही है। हाल ही में बरसोल स्थित नटराज होटल में पूर्व मंडल अध्यक्ष चुनु महाली की अध्यक्षता में हुई बैठक में कार्यकर्ताओं ने खुलकर चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल उठाए। कार्यकर्ताओं का कहना है कि पहले 11 पंचायतों के सक्रिय सदस्यों की बैठक बुलाकर सहमति से अध्यक्ष चुना जाता था, लेकिन इस बार ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं अपनाई गई।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र में फैल सकता है और संगठन के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। ऐसे में अब सभी की निगाहें जिला ग्रामीण अध्यक्ष सत्या तिवारी पर टिकी हैं, जिनसे उम्मीद की जा रही है कि वे “फायर ब्रिगेड” की भूमिका निभाते हुए इस सुलगती आग को शांत करेंगे।
फिलहाल, मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए यह कहना मुश्किल नहीं कि अगर जल्द ही समाधान नहीं निकाला गया, तो यह अंदरूनी कलह भाजपा के लिए आने वाले समय में बड़ा राजनीतिक नुकसान साबित हो सकती है।











