रांची: JPSC परीक्षा से जुड़े मुद्दों को लेकर पिछले करीब 20 दिनों से अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठे JLKM नेता देवेंद्रनाथ महतो की तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें रांची सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया। स्वतंत्रता दिवस के दिन उन्होंने अस्पताल से बाहर निकलकर तिरंगा यात्रा में शामिल होने की इच्छा जताई, लेकिन स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए डॉक्टरों ने उन्हें बाहर जाने की अनुमति नहीं दी।
इसके बाद सदर अस्पताल प्रबंधन ने साफ कर दिया कि किसी मरीज को जबरदस्ती अस्पताल में नहीं रखा जा सकता। अगर मरीज इलाज बीच में छोड़कर जाना चाहता है, तो LAMA यानी Leave Against Medical Advice की प्रक्रिया पूरी कर वह अपनी जिम्मेदारी पर अस्पताल छोड़ सकता है।
अब सवाल ये है कि जब अस्पताल से बाहर जाने का विकल्प मौजूद था, तो देवेंद्रनाथ महतो अस्पताल से बाहर क्यों नहीं निकले? तिरंगा यात्रा में शामिल होने की बात करने के बावजूद अस्पताल में ही रहकर इलाज जारी रखने का फैसला आखिर क्यों किया गया?
अस्पताल में भर्ती होने के बाद देवेंद्रनाथ महतो और उनके समर्थकों के रवैये को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। अस्पताल प्रबंधन का आरोप है कि लगातार बातचीत और हंगामे की स्थिति बन रही है, जिससे अस्पताल का सामान्य कामकाज प्रभावित हो रहा है और दूसरे मरीजों को भी परेशानी हो रही है।
अस्पताल प्रबंधन की ओर से यह भी आरोप लगाया गया है कि उनके कुछ सहयोगियों के साथ अस्पताल के कर्मचारियों और प्रबंधन के बीच कहासुनी और धक्का-मुक्की की स्थिति बनी। अगर ऐसा हुआ है तो सवाल यह है कि इलाज के लिए पहुंचे अस्पताल को आंदोलन का नया अखाड़ा बनाने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी?
JPSC छात्रों के भविष्य से जुड़ा गंभीर मुद्दा है और उस पर आंदोलन भी हो रहा है। लेकिन क्या आंदोलन की गंभीरता बनाए रखने के बजाय अस्पताल परिसर में हंगामा, कैमरे और सोशल मीडिया की गतिविधियां ज्यादा महत्वपूर्ण हो रही हैं? क्या छात्र आंदोलन का मुद्दा पीछे छूटकर पूरा फोकस एक नेता की मौजूदगी और राजनीतिक छवि पर आ गया है?
पिछले दिनों विधानसभा घेराव के दौरान रील्स को लेकर सामने आए वीडियो के बाद भी सवाल उठे थे। ऐसे में अब अस्पताल के भीतर की गतिविधियों ने एक बार फिर बहस छेड़ दी है कि आंदोलन की राजनीति कहां तक जायज है और अस्पताल जैसे संवेदनशील स्थान पर इसकी सीमा क्या होनी चाहिए।
फिलहाल देवेंद्रनाथ महतो का इलाज सदर अस्पताल में जारी है और डॉक्टर उनकी स्वास्थ्य स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। लेकिन अस्पताल प्रबंधन के बयान के बाद सवाल जरूर खड़ा हो गया है—इलाज चाहिए या अस्पताल को ही आंदोलन का मंच बनाया जा रहा है?








