प्रयागराज स्थित इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को बड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने माफिया मुख्तार अंसारी के चचेरे भाई मंसूर अंसारी की संपत्ति की कुर्की के आदेश को रद्द कर दिया है। ट्रायल के दौरान अदालत ने पाया कि राज्य यह साबित करने में असफल रहा कि मंसूर अंसारी की भवन और दुकानों का निर्माण किसी आपराधिक गतिविधि या गैंगस्टर एक्टिविटी से जुड़ा हुआ था।
जस्टिस राज बीर सिंह ने अपने फैसले में कहा कि केवल आरोप या किसी कुख्यात गैंगस्टर से संबंध होने के आधार पर किसी की संपत्ति जब्त नहीं की जा सकती। अदालत ने स्पष्ट किया कि अपराध और संपत्ति के बीच स्पष्ट संबंध होना अनिवार्य है, और किसी अपराध में संभावित संलिप्तता केवल यही आधार नहीं बन सकती कि संपत्ति कुर्क की जाए।
इससे पहले गाजीपुर के विशेष न्यायाधीश ने डीएम के आदेश को बरकरार रखते हुए मंसूर अंसारी की 26,18,025 रुपये मूल्य की दुकानों और भवन को कुर्क करने का आदेश दिया था। यह कदम इसलिए उठाया गया था कि माना गया कि ये संपत्तियां मुख्तार अंसारी की ‘बेनामी’ संपत्ति हैं। हालांकि, हाईकोर्ट ने गैंगस्टर अधिनियम की धारा 14 की जांच करते हुए पाया कि डीएम की कुर्की की शक्ति निरपेक्ष नहीं है और राज्य ने इसे वैध साबित करने में असफल रहा।

न्यायालय ने कहा कि यह साबित करने की जिम्मेदारी पूरी तरह राज्य पर है कि संपत्ति किसी अपराध के परिणामस्वरूप अर्जित की गई है। अपीलकर्ता से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह अपनी संपत्ति के स्रोत की जानकारी स्वयं प्रस्तुत करे। हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि मंसूर अंसारी का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और उन्हें 2007 में मुख्तार अंसारी के खिलाफ दर्ज किसी मामले में आरोपी नहीं बनाया गया था। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि चुनौती किए गए आदेश का आधार केवल अनुमान और अटकलें थीं।
इस फैसले से यह साफ हो गया है कि गैंगस्टर अधिनियम के तहत संपत्ति कुर्क करने के लिए राज्य को ठोस और कानूनी सबूत पेश करना अनिवार्य है। केवल रिश्तेदारी या किसी आपराधिक गतिविधि में संभावित संलिप्तता को आधार बनाकर कार्रवाई नहीं की जा सकती।











