झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) एक बार फिर अपनी परीक्षा प्रणाली में बरती गई लापरवाही के कारण विवादों के घेरे में आ गया है। रविवार को आयोजित सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा (पीटी) के दौरान प्रश्न पत्रों में हिंदी अनुवाद की ऐसी गंभीर गलतियां सामने आईं, जिसने अभ्यर्थियों और विशेषज्ञों को हैरान कर दिया है। सामान्य अध्ययन के पेपर-2 में खासतौर पर स्थानीय शब्दों और ऐतिहासिक व्यवस्थाओं से जुड़े नामों को गलत तरीके से छापा गया, जिससे परीक्षार्थियों के बीच भारी भ्रम की स्थिति बनी रही।
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि झारखंड की पारंपरिक ‘डोकलो’ शासन व्यवस्था को प्रश्न पत्र में ‘ठोकलो’ लिख दिया गया, जबकि ‘पड़हा’ को ‘परहा’ और प्रसिद्ध ‘सारंडा’ वन क्षेत्र को ‘सारंदा’ के रूप में अंकित किया गया। इसके अलावा, राज्य के सांस्कृतिक नृत्य ‘पाइका’ को ‘पड़का’ और विश्वविद्यालय से जुड़े प्रश्न में ‘नीलांबर’ को ‘निलंबर’ छापकर लापरवाही की पराकाष्ठा दिखाई गई। केवल पेपर-2 ही नहीं, बल्कि पेपर-1 में भी अंतरराष्ट्रीय स्तर के ‘ब्रेटन वुड्स सम्मेलन’ को ‘बेटेन वुड्स’ लिखकर त्रुटि की गई।

विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि यह केवल सामान्य टाइपिंग की त्रुटियां नहीं हैं, बल्कि यह जेपीएससी के पूरे सिस्टम की विफलता को उजागर करता है। किसी भी राज्य स्तरीय बड़ी परीक्षा के प्रश्न पत्र तैयार करने के बाद मॉडरेशन और गहन प्रूफरीडिंग की एक अनिवार्य प्रक्रिया होती है, जिसका इस मामले में पूरी तरह अभाव दिखता है। यदि इन बुनियादी प्रक्रियाओं का पालन किया गया होता, तो ऐसी बुनियादी अशुद्धियों को समय रहते सुधारा जा सकता था।
अभ्यर्थियों ने इस पर गहरा रोष व्यक्त करते हुए कहा है कि परीक्षा का संचालन तो ठीक रहा, लेकिन प्रशासनिक सेवा जैसी गरिमामयी परीक्षा में इस स्तर की अशुद्धियां पूरी तरह से अस्वीकार्य हैं। छात्रों का तर्क है कि यदि शब्दों के अर्थ ही बदल जाएंगे, तो क्या परीक्षार्थियों को अब अनुमान के आधार पर उत्तर देने होंगे। गौर करने वाली बात यह भी है कि इससे पहले भी सहायक वन संरक्षक मुख्य परीक्षा में अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद में 65 से अधिक अशुद्धियां मिली थीं, जिस पर आयोग ने अब तक कोई ठोस जवाब नहीं दिया है। फिलहाल, छात्र और विशेषज्ञ आयोग से इस लापरवाही की जिम्मेदारी तय करने और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने की मांग कर रहे हैं।









