लेखक - रचना मिश्रा पांडे
आधुनिक परिवेश में बड़ी तेजी से सामाजिक मानदंड में बदलाव आ रहा है। यहांँ लोग अपनी प्रसन्नता और मानसिक शांति को सर्वप्रथम रखते हैं। परिणाम स्वरुप यदि विवाह जैसे बंधन में भी प्रसन्नता तथा मानसिक शांति ना हो, तो विवाह विच्छेद या तलाक की स्थिति बन जाती है ।हालांकि तलाक पति-पत्नी के बीच में होता है, पर चाहे अनचाहे बच्चे भी इसकी चपेट में आ जाते हैं।
पति-पत्नी अपने जीवन में आगे बढ़ जाते हैं, किंतु बच्चों के मन में यह अलगाव बहुत धीरे-धीरे उतरता है ।और कई बार जीवन भर के लिए अपना असर छोड़ देता है ।यहीं तलाकशुदा माता-पिता को यह समझना होगा कि हम भले साथ ना हो पर जिम्मेदार माता-पिता हों।अर्थात भले ही हम पति-पत्नी के रूप में साथ ना रहे, किंतु एक माता-पिता बनकर अपने बच्चों के साथ हमेशा हर परिस्थिति में हों। अर्थात पति-पत्नी का संबंध -विच्छेद हो सकता है, किंतु माता-पिता का दायित्व समाप्त नहीं हो सकता।
बच्चे अक्सर अधूरापन और खालीपन का शिकार हो जाते हैं, जब उन्हें माता या पिता दोनों में से किसी एक को चुनना पड़ता है। किसी एक को चुनना मतलब दूसरे को खो देना ।यह बहुत भारी मानसिक बोझ है। माता या पिता को खोना ,सिर्फ माता या पिता खो देना नहीं होता है बल्कि भीतर से एक सुरक्षा की भावना को खो देना होता है जो बच्चों के विकास में अवरोध उत्पन्न करता है।
बच्चे अधिक बोलते नहीं है किंतु चुपचाप अपने माता या पिता जिसे वह दूर हैं उन्हें याद करते रहते हैं कभी-कभी काल्पनिक दुनिया में रहना अधिक पसंद करते हैं, जहांँ वह अपने माता-पिता के साथ एक सामान्य स्थिति में निर्भीक होकर रह सकें। जो उनके वास्तविक जीवन के लिए हानिकारक होता है।
माता या पिता से मिलने से रोकना एक भावनात्मक दंड देना है, बच्चे को उस गलती का दंड मिलता है जो उन्होंने किया ही नहीं।
यहांँ अभिभावकों को दूरदर्शी होना आवश्यक है ।उन्हें अपने क्रोध, अहम् तथा हृदय में उठते विभिन्न उहा-पोह भरी स्थिति को संयमित करते हुए एक ऐसी स्थिति को उत्पन्न करने का प्रयास करना चाहिए, कि चाहे बच्चा अपने माता या पिता दोनों में से किसी की भी देखरेख में हो, लेकिन उसे मिलने की अनुमति माता-पिता दोनों से होनी चाहिए । ताकि बच्चों में कभी असुरक्षा की भावना ना बन सके, भले ही पति- पत्नी साथ ना रहे, पर यह निश्चय कर ले कि बच्चों के पालन पोषण से संबंधित कोई भी बात हो चाहे उनकी पढ़ाई -लिखाई हो या साथ बिताने वाला कोई पर्व -त्यौहार हो स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हो या फिर भावनात्मक सहयोग की आवश्यकता हो हमेशा माता-पिता दोनों बच्चे के साथ होंगे। ऐसे में बच्चा कभी अकेलापन या खालीपन का शिकार नहीं होगा ।
ध्यान रखना होगा ,कि संबंध -विच्छेद पति-पत्नी के बीच होता है अभिभावक और बच्चों के बीच नहीं होता । एक पति को दूसरी पत्नी मिल सकती है ,एक पत्नी को दूसरा पति भी मिल सकता है, किंतु एक बच्चे को दूसरा जन्मदाता नहीं मिल सकता ।अतः माता-पिता को यह ध्यान अवश्य रखना चाहिए ,कि अपने तलाक में बच्चों को शामिल न करें ।भले ही पति-पत्नी बनकर साथ ना रहे ,पर जिम्मेदार माता-पिता बनकर अवश्य रहे । तथा अलग होने के बावजूद बच्चों के प्रति प्रेम और सुरक्षा के साथ कोई समझौता न करें।

लेखक - रचना मिश्रा पांडे
दर्शकों के लिए सवाल
- क्या तलाक के बाद भी माता-पिता का समान दायित्व निभाया जाना संभव है?
- क्या बच्चों को माता या पिता में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर करना सही है?
- बच्चों की मानसिक शांति के लिए सह-पालन (Co-Parenting) कितना आवश्यक है?
- क्या समाज को तलाकशुदा माता-पिता के प्रति अपनी सोच बदलने की जरूरत है?
- इस विषय पर आपका क्या अनुभव या विचार है? कमेंट में साझा करें।









