"ना करें किसी की निजी बातों को सार्वजनिक" --:
वजह चाहे कोई भी हो ,नाराजगी जताना हो, या अपनापन दिखलाना हो, निजता का हनन हमारे समाज की एक सामान्य घटना है ।जिससे पीड़ित व्यक्ति कुंठित होने के अलावा कुछ कर भी नहीं पाता। मानसिक तनाव झेलने के अलावा उसके पास दूसरा कोई विकल्प नहीं होता।
अक्सर देखा जाता है, कि जब एक व्यक्ति दूसरे से नाराज़ होता है तो उसकी निंदा करते समय उसके गुणों को शून्य कर देता है ,और यह भी ध्यान नहीं रखना की कि वह कितने लोगों के बीच उसकी निंदा कर रहा है। लेकिन हद तो तब होती है जब लोग निंदा करते समय अपना दायरा भूल जाते हैं ,तथा किसी की निजी बातों को सार्वजनिक करने लगते हैं। क्या हमने कभी सोचा है कि निंदा की भी अपनी एक सीमा होती है, और कितना भी क्रोध या नाराज़गी में उस सीमा का उल्लंघन करना असभ्यता तथा क्रूरता का परिचायक है?
चाहे कितनी भी नाराज़गी क्यों ना हो, हमें सामने वाले की निजता का ध्यान रखना चाहिए जिन बातों को किसी ने हमें कभी विश्वास करके बताया हो, उन बातों को बिना उसकी अनुमति के सार्वजनिक करने का हमें कोई अधिकार नहीं ।किसी के व्यक्तिगत बातों को सबके बीच प्रकट करना असभ्यता के साथ-साथ एक प्रकार की क्रूरता इसलिए है ,क्योंकि ऐसा करके हम सामने वाले को मानसिक तनाव में डाल सकते हैं।
एक महत्वपूर्ण बात यह भी है,कि उस व्यक्ति के विश्वास का टूटना सिर्फ उसका नुकसान नहीं है जिसकी बातें सार्वजनिक हो रही है, बल्कि हमारा भी नुकसान है जो उसकी बातें सार्वजनिक कर रहे हैं। क्योंकि जितने लोगों के बीच हमने ऐसा किया है, हम उतने लोगों का विश्वास खो देते हैं। वहांँ उपस्थित कोई भी व्यक्ति हमसे निजी बातें साझा करने का साहस नहीं करेगा।
जब हमें किसी की कोई बात बुरी लगे तो वह बात चुपचाप किसी अपने को सीमित मात्रा में बताना उचित होगा। ना की सार्वजनिक रूप से उसके व्यक्तिगत बातों को घसीट लिया जाए जिसका मुद्दे से कोई लेना देना ही ना हो ।हमें अपनी बातें इसलिए साझा करनी चाहिए, ताकि हमारा मन हल्का हो सके ना कि दूसरे का मन भारी हो जाए।
नाराजगी के अलावा यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अपनेपन या मित्रता की आड़ में भी हम कभी किसी की निजता का हनन न करें। जैसे कोई विवाह कब करेगा ?किसी की संपत्ति कितनी है ?बच्चे कब प्लान करेगा? या उसके निजी रिश्तों के बारे में, सब कुछ किसी व्यक्ति का नितांत निजी मामला है अचानक सार्वजनिक रूप से दोस्ती या अपनेपन की आड़ में हमें ऐसे प्रश्न किसी से नहीं पूछना चाहिए जो किसी को असहज बना दे।
किसी की व्यक्तिगत बातों को बिना उसकी अनुमति के सार्वजनिक करना उसके प्रति किया गया अन्याय है आम बातचीत में जब किसी की निजी बातों को उछाला जाता है, तो यह एक मानसिक प्रताड़ना का रूप ले लेता है। व्यक्ति का आत्म बल कमजोर हो जाता है ,और वह समाज में सहज रूप से नहीं रह पाता। किसी की व्यक्तिगत बातों को सार्वजनिक करना मौखिक हिंसा का एक प्रकार है।
हमारा दायित्व है कि यदि कोई व्यक्ति किसी की निंदा के क्रम में उसके निजी बातों को उछाल रहा हो तो हमें तुरंत उन निजी बातों को सुनने से इनकार कर देना चाहिए ।और सही बात का पक्ष लेना चाहिए। किसी की निजी बातों को निंदा के रूप में सुनना फिर किसी तीसरे तक पहुंँचाना एक क्रूर मानसिकता को दर्शाता है ,हमें इससे बचना होगा।
अतः निंदा करते या सुनते समय भी हमें दूसरों के प्रति संवेदनशीलता और सम्मान का ध्यान रखना चाहिए।
ध्यान रहे ,किसी की निजता की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। और हर व्यक्ति की निजता उसका अधिकार।
लेखक - रचना मिश्रा पांडे

- क्या ग़ुस्से में किसी की निजी बात सार्वजनिक करना सही है?
- क्या निंदा की भी एक नैतिक सीमा होनी चाहिए?
- क्या विश्वास तोड़ना, बोलने वाले का भी नुकसान नहीं करता?
- क्या निजी बातें उछालना मौखिक हिंसा का रूप है?
- क्या “अपनेपन” के नाम पर पूछे गए सवाल हमेशा जायज़ होते हैं?
- क्या हमें किसी की निजी बातें सुनने से इंकार करना सीखना चाहिए?
- क्या किसी की निजता की रक्षा करना हमारा सामूहिक दायित्व है?









