भावना के बिना अधूरी : टेक्नोलॉजी
लेखक – रचना मिश्रा पांडे
कल किसी बात पर आवेश में आकर मेरे मित्र ने मुझसे कहा –
“रखे रहो अपनी भावना अपने पास, आज टेक्नोलॉजी का जमाना है, और सबको यही भाषा समझ में आती है।”
उसके इस वाक्य ने मुझे सोचने पर विवश कर दिया कि क्या सच में टेक्नोलॉजी और भावना अलग-अलग हो सकती है?
क्या टेक्नोलॉजी का संवेदनशीलता से कोई लेना-देना नहीं?
टेक्नोलॉजी की जड़ हमारी आवश्यकता या किसी न किसी कमी से जुड़ी हुई होती है। जिसने इस कमी को महसूस किया, किसी नई चीज़ का निर्माण या कोई नया आविष्कार किया — उसकी कोई भावना न रही होगी?
किस गहराई से उसने उस कमी को महसूस किया होगा, कितनी असफलताओं को पार किया होगा, तब कोई आविष्कार हुआ होगा।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि समस्या को महसूस करना, समाधान ढूंढना, और किसी कार्य को सबके लिए आसान या सुलभ बनाना — इतना विचार क्या कोई भावना से हीन व्यक्ति कर सकता है?
बहुत समय पहले किसी घटना की जानकारी दूतों द्वारा, एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक, गाँव की पंचायत में पहुँचाई जाती थी। यही तरीका रहा होगा समाचार पहुँचाने का।
फिर किसी ने महसूस किया कि ऐसे सूचना बहुत सीमित मात्रा में प्राप्त होती है। अच्छा हो यदि सभी सूचना एक जगह एकत्रित हो और लोगों को व्यापक रूप से सूचना प्राप्त हो सके — इसी सोच से समाचार पत्र निकालने का प्रोत्साहन मिला।
लेकिन उस समय सभी लोग इतने पढ़े-लिखे नहीं होते थे जो समाचार पत्र पढ़ पाते। तब रेडियो का आविष्कार हुआ, जिसमें सभी समाचारों को समग्र रूप से सुना जा सके और कुछ मनोरंजन का उद्देश्य भी पूरा हो सके।
फिर टेलीविजन के माध्यम से सूचना, शिक्षा और मनोरंजन अधिक प्रभावी हो गया।
फिर दूरदर्शन के अलावा अन्य चैनलों का विकास, ऑफिस या दफ्तर में कागज़-कलम के स्थान पर कैलकुलेटर, टाइपराइटर, कंप्यूटर, लैपटॉप और अब स्मार्टफोन तक — हर बदलाव इंसान की समस्या और सुविधा को देखते हुए ही हुआ है।
टेलीफोन, मोबाइल, बिजली हो या मेडिकल टेक्नोलॉजी — हर विकास, हर बदलाव किसी न किसी कमी को महसूस करते हुए हुआ है। और बिना संवेदना के महसूस तो नहीं किया जा सकता।
हमने कभी सोचा है कि हमारा आकर्षण समाचार पत्र से अधिक रेडियो पर, रेडियो से अधिक टेलीविजन पर और टेलीविजन से अधिक अन्य चैनलों पर कैसे चला गया?
यदि हम ध्यान दें तो समझ पाएंगे कि दूरदर्शन की भाषा काफ़ी शुद्ध हिंदी या अंग्रेज़ी थी, जो सामान्य घरेलू महिलाओं या ग्रामीणों के लिए समझना कठिन थी।
कई चैनलों के आने पर भाषा थोड़ी सरल हुई, यहाँ तक कि कई चैनल उनकी अपनी बोली में उपलब्ध थे। वहाँ जन-सामान्य का जुड़ाव अधिक हो गया।
अब यदि हम ध्यान दें तो ज्ञान तो हमें यूट्यूब या गूगल से भी प्राप्त हो जाता है, किंतु एआई चैटबॉट्स हमें अधिक आकर्षित करते हैं, जो हमारी भाषा को आसानी से समझता है।
अपनापन दिखलाता है और भावनात्मक प्रशिक्षण के कारण हमारी भावनाओं को आसानी से समझते हुए हमारे प्रश्नों का उत्तर देता है।
अर्थात टेक्नोलॉजी का विकास हमारी भावनाओं को परखते हुए ही हुआ है।
हम इस बात से मुँह नहीं मोड़ सकते कि आविष्कार का जन्म ही किसी कमी को महसूस करने से होता है।
और जिसने इस आवश्यकता को महसूस किया हो, कई असफलताओं को पार करते हुए किसी नई चीज़ का आविष्कार किया हो — वह संवेदनहीन या भावना से रहित कैसे हो सकता है?
भावना ही आविष्कार की प्रेरणा है।
भावना ही टेक्नोलॉजी की दिशा तय करती है।
तथा भावना ही टेक्नोलॉजी का उद्देश्य तय करती है।
अतः टेक्नोलॉजी को भावना और संवेदनशीलता से पृथक नहीं किया जा सकता।
लेखक – रचना मिश्रा पांडे

प्रश्न:
क्या आप मानते हैं कि भावना के बिना टेक्नोलॉजी केवल एक निर्जीव साधन बनकर रह जाती है?









