Deoria News: क्या आज के दौर में बच्चों को अनुशासन सिखाना माता-पिता के लिए जोखिम भरा काम हो गया है? उत्तर प्रदेश के देवरिया से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने बाप-बेटे के रिश्ते और परवरिश के तरीकों पर नई बहस छेड़ दी है। यहाँ एक पिता को अपने ही बेटे के पैरों में गिरकर माफी मांगनी पड़ी, ताकि उनका लाडला घर वापस लौट आए।
क्या है पूरा मामला? (The Incident)
मामला देवरिया के सदर कोतवाली क्षेत्र के उमानगर मोहल्ले का है। यहाँ रहने वाले एक प्रतिष्ठित व्यापारी का बेटा 11वीं कक्षा में पढ़ता है। शुक्रवार को किसी बात पर पिता ने बेटे को कुछ लोगों के सामने डांट दिया। बस, यही बात किशोर को चुभ गई। उसे लगा कि सरेआम उसकी 'इज्जत' (Self-Respect) का कचरा हो गया है।
गुस्से में तमतमाया हुआ छात्र सीधे पुलिस स्टेशन पहुंच गया और अपने ही पिता के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग करने लगा।
जब पुलिस भी रह गई दंग
थाने में जब एक किशोर ने अपने पिता के खिलाफ तहरीर देने की बात कही, तो पुलिसकर्मी भी सन्न रह गए। आनन-फानन में पिता को कोतवाली बुलाया गया। पुलिस के सामने पिता ने अपना पक्ष रखा और बेटे को बहुत समझाया, लेकिन लड़का अपनी जिद पर अड़ा रहा। वह किसी भी कीमत पर पिता के साथ घर जाने को तैयार नहीं था और सजा दिलवाने की रट लगाए बैठा था।
बेबस पिता और जिद पर अड़ा बेटा
करीब एक घंटे तक हाई-वोल्टेज ड्रामा चलता रहा। पुलिस और परिजनों की तमाम कोशिशें नाकाम रहीं। अंत में, एक लाचार पिता को अपने जिद्दी बेटे के सामने झुकना ही पड़ा। समाज और पुलिस के सामने पिता ने हाथ जोड़े और बेटे के पैरों में गिरकर अपनी 'गलती' की माफी मांगी। पिता को इस कदर गिड़गिड़ाते देख जब बेटे का गुस्सा शांत हुआ, तब जाकर वह घर लौटने को राजी हुआ।
पैरेंटिंग पर उठ रहे हैं बड़े सवाल
यह घटना सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई है। लोग पूछ रहे हैं:
- क्या अब बच्चे इतने संवेदनशील हो गए हैं कि छोटी सी डांट भी बर्दाश्त नहीं कर पा रहे?
- क्या अनुशासन सिखाने के लिए माता-पिता का गुस्सा करना अब उन्हें जेल की हवा खिला सकता है?
- डिजिटल युग में मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) और अनुशासन के बीच की लकीर कहाँ है?
एक्सपर्ट्स की राय: मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि बच्चों को सबके सामने डांटने से उनकी आत्म-छवि (Self-Image) को ठेस पहुंचती है। हालांकि, पुलिस के पास जाना और पिता को पैरों पर गिराना रिश्तों में संवाद की भारी कमी को दर्शाता है।
निष्कर्ष: देवरिया की यह 'अजब-गजब' कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि परवरिश का तरीका अब बदलना होगा, वरना अनुशासन की जगह 'अहंकार' ले लेगा।
क्या आपको लगता है कि बेटे का अपने पिता को थाने ले जाना सही था? अपनी राय हमें कमेंट में जरूर बताएं।









