जब 'रामराज्य' के दावे शर्मसार हुए
तारीख: 29 दिसंबर 2025। सुप्रीम कोर्ट के गलियारों में सन्नाटा था, लेकिन फैसला गूंजने वाला था। जब तीन जजों की बेंच ने दिल्ली हाई कोर्ट के सजा रद्द करने वाले फैसले पर रोक लगाई, तो यह सिर्फ एक मुजरिम की हार नहीं थी, बल्कि उस सत्ता तंत्र की भी हार थी जिसने 8 साल तक एक अपराधी को अपने कवच के पीछे छिपाए रखा। यह कहानी है उन्नाव की उस बेटी की, जिसे इंसाफ पाने के लिए अपनों की लाशें ढोनी पड़ीं।
4 जून 2017: वह रात जब सिस्टम सो रहा था
नौकरी दिलाने के बहाने विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के आवास पर बुलाई गई एक नाबालिग लड़की के साथ जो हुआ, उसने मानवता को शर्मसार कर दिया।
- सत्ता का दंभ: सेंगर सिर्फ एक विधायक नहीं था, वह उन्नाव का 'बेताज बादशाह' था। उसे यकीन था कि वर्दी उसकी जेब में है और कानून उसके कदमों में।
- साजिश की शुरुआत: वारदात के बाद पीड़िता जब पुलिस के पास गई, तो पुलिस ने उसे डराकर भगा दिया। सरकार के 'बेटी बचाओ' के नारे माखी गाँव की उन गलियों में दम तोड़ रहे थे।
2018: सरकार की चुप्पी और पिता की 'हत्या'
एक साल तक पीड़िता भटकती रही, लेकिन लखनऊ के गलियारे खामोश रहे।
- 3 अप्रैल 2018: विधायक के भाई अतुल सिंह ने सरेआम पीड़िता के पिता को पीटा।
- प्रशासन का काला चेहरा: पुलिस ने घायल पिता का इलाज कराने के बजाय उन्हें ही अपराधी बना दिया। जेल में उनकी रीढ़ की हड्डी तोड़ दी गई।
- 9 अप्रैल 2018: पुलिस कस्टडी में पिता की मौत हो गई। यह 'हिरासत में हत्या' थी। जब पीड़िता ने सीएम आवास के सामने आत्मदाह की कोशिश की, तब जाकर सरकार की नींद टूटी। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
सरकार और पार्टी का दोहरा चरित्र
शुरुआती महीनों में बीजेपी और सरकार सेंगर को बचाने में जुटी रही। विपक्ष चिल्लाता रहा, जनता सड़क पर रही, लेकिन सेंगर को पार्टी से निकालने में सरकार ने महीनों लगा दिए।
- बचाव पक्ष का तर्क: कोर्ट में सेंगर के वकीलों ने 'डिजिटल सबूतों' का मायाजाल बुना। यह दावा किया गया कि सेंगर वहां थे ही नहीं।
- सत्ता की ताकत: विधायक की बेटी ऐश्वर्या ने इसे राजनीतिक साजिश बताया। लेकिन सवाल यह था कि क्या एक 17 साल की लड़की अपने पिता की लाश पर राजनीति करेगी?
जुलाई 2019: 'हादसा' या सरेआम कत्लेआम?
जब जेल के अंदर से भी सेंगर की हनक कम नहीं हुई, तो रायबरेली के हाईवे पर एक ट्रक ने पीड़िता की कार को कुचल दिया।
- मौत का तांडव: चाची और मौसी की मौत हो गई। पीड़िता वेंटिलेटर पर चली गई।
- सिस्टम की विफलता: पीड़िता को सुरक्षा मिली हुई थी, फिर भी वह ट्रक उसकी कार तक कैसे पहुँचा? ट्रक की नंबर प्लेट पर कालिख क्यों थी? ये सवाल आज भी यूपी सरकार के माथे पर कलंक हैं।
कोर्ट रूम की बहस: 'फेक अलिबी' का पर्दाफाश
दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट में जब बहस हुई, तो सेंगर के रसूख की धज्जियां उड़ गईं।
- जज की टिप्पणी: कोर्ट ने साफ कहा कि सेंगर जैसे ताकतवर लोग अपना फोन किसी और को देकर 'फेक लोकेशन' बनवा सकते हैं।
- फैसला: दिसंबर 2019 में सेंगर को उम्रकैद हुई। कोर्ट ने माना कि यह सिर्फ रेप नहीं, बल्कि एक रसूखदार व्यक्ति द्वारा एक गरीब परिवार को मिटाने की संगठित कोशिश थी।
2023-2025: न्याय की लुका-छिपी
दिसंबर 2023 में दिल्ली हाई कोर्ट ने सेंगर की सजा पर रोक लगा दी। ऐसा लगा मानो सत्ता की पकड़ फिर से मजबूत हो गई है। सेंगर के समर्थकों ने जश्न मनाना शुरू कर दिया। लेकिन सीबीआई और पीड़िता हार मानने को तैयार नहीं थे। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।
- 29 दिसंबर 2025 का ऐतिहासिक दिन: सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की उदारता को फटकार लगाई। चीफ जस्टिस ने साफ किया कि बलात्कार जैसे जघन्य अपराध में 'टेक्निकल' आधार पर राहत नहीं दी जा सकती। सेंगर की उम्रकैद बहाल रही।
निष्कर्ष: सत्ता बनाम सत्य
उन्नाव कांड यह सबक है कि जब सत्ता किसी अपराधी को पालती है, तो न्याय का रास्ता श्मशान से होकर गुजरता है। 8 साल की इस जंग में पीड़िता ने अपना पिता खोया, अपने रिश्तेदार खोए, अपना घर खोया, लेकिन अपनी हिम्मत नहीं खोई।
आज कुलदीप सिंह सेंगर जेल में हैं, लेकिन यह मामला उत्तर प्रदेश के इतिहास में हमेशा इस बात के लिए याद किया जाएगा कि कैसे एक 'बेटी' ने पूरे सिस्टम और सत्ता के गुरूर को धूल चटा दी।
टाइमलाइन: इंसाफ का सफर (एक नजर में)
तारीख | घटना |
4 जून 2017 | विधायक आवास पर नाबालिग के साथ रेप। |
9 अप्रैल 2018 | पुलिस कस्टडी में पीड़िता के पिता की मौत। |
13 अप्रैल 2018 | भारी जनदबाव के बाद सीबीआई ने सेंगर को गिरफ्तार किया। |
28 जुलाई 2019 | रायबरेली में पीड़िता की कार का 'संदेहास्पद' एक्सीडेंट। |
20 दिसंबर 2019 | तीस हजारी कोर्ट ने सेंगर को उम्रकैद सुनाई। |
29 दिसंबर 2025 | सुप्रीम कोर्ट ने सेंगर की उम्रकैद बरकरार रखी, हाई कोर्ट का फैसला पलटा। |
यह रहा उन्नाव कांड का वह हिस्सा जिसे अक्सर फाइलों में दबा दिया जाता है। इस बार हम उन चेहरों और उस सिस्टम की बात करेंगे जिसने कुलदीप सेंगर को 'माननीय' बनाए रखने के लिए कानून की धज्जियां उड़ाईं।
उन्नाव कांड: 'खाकी' और 'खादी' का वह गठजोड़ जिसने न्याय का गला घोंटा
विशेष रिपोर्ट: साजिश के पीछे के किरदार
वो पुलिसवाले जो विधायक के 'गुलाम' बन गए
जब पीड़िता न्याय के लिए भटक रही थी, तब उन्नाव पुलिस का रवैया किसी रक्षक जैसा नहीं, बल्कि सेंगर के निजी बाउंसर जैसा था।
- माखी थाना इंचार्ज अशोक सिंह भदौरिया: यह वह नाम है जिसने पूरी साजिश को जमीन पर उतारा। जब पीड़िता के पिता को विधायक के भाई ने अधमरा कर दिया, तो अशोक भदौरिया ने विधायक के इशारे पर पीड़िता के पिता के खिलाफ ही 'आर्म्स एक्ट' का झूठा मुकदमा दर्ज कर उन्हें जेल भेज दिया।
- सब-इंस्पेक्टर कामता प्रसाद: जेल के अंदर और बाहर की सेटिंग में इस अधिकारी की भूमिका संदिग्ध रही। इन पुलिसकर्मियों को बाद में सीबीआई ने गिरफ्तार किया और कोर्ट ने इन्हें भी दोषी मानकर सजा सुनाई।
सत्ता का खेल: सोचिए, एक घायल आदमी जिसकी पीठ पर 18 से ज्यादा चोट के निशान थे, पुलिस ने उसे अस्पताल ले जाने के बजाय हवालात में डाल दिया ताकि वह मर जाए और गवाही खत्म हो जाए।
प्रशासन की मिलीभगत: डीएम और एसपी की खामोशी
उन्नाव की तत्कालीन डीएम अदिति सिंह और एसएसपी पुष्पांजलि पर भी गंभीर सवाल उठे।
- पीड़िता ने बार-बार इन अधिकारियों को पत्र लिखे, मिलने की कोशिश की, लेकिन 'ऊपर' के दबाव में इन अधिकारियों ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की।
- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस पर कड़ी टिप्पणी की थी कि "प्रशासन तब तक क्यों सोया रहा जब तक पीड़िता ने खुद को आग लगाने की कोशिश नहीं की?"
नेताओं का संरक्षण: 'हमारा विधायक निर्दोष है'
सत्ता पक्ष के कई बड़े नेताओं ने शुरुआत में सेंगर का खुलकर बचाव किया।
- साक्षी महाराज (सांसद, उन्नाव): सेंगर की गिरफ्तारी के बाद भी साक्षी महाराज जेल में उनसे मिलने गए और उन्हें 'शुभकामनाएं' दीं। उन्होंने सार्वजनिक रूप से सेंगर का पक्ष लिया, जिससे समाज में यह संदेश गया कि पार्टी अपराधी के साथ खड़ी है।
- पार्टी की देरी: बीजेपी ने सेंगर को पार्टी से निकालने में दो साल लगा दिए। जब 2019 में पीड़िता का एक्सीडेंट हुआ और पूरे देश में गुस्सा भड़क उठा, तब जाकर पार्टी ने उसे निष्कासित किया। इससे पहले उसे सिर्फ 'निलंबित' करके खानापूर्ति की गई थी।
साजिश का 'मास्टरमाइंड' भाई: अतुल सिंह सेंगर
कुलदीप सेंगर अगर दिमाग था, तो उसका भाई अतुल सिंह सेंगर उसकी 'ताकत' था।
- अतुल ने ही पीड़िता के पिता को सरेआम घसीटकर पीटा था।
- सीबीआई जांच में सामने आया कि एक्सीडेंट वाले ट्रक के मालिक और क्लीनर का संबंध भी कहीं न कहीं विधायक के करीबियों से था।
सुप्रीम कोर्ट का वह ऐतिहासिक 'फटकार'
जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा, तो तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने यूपी सरकार से पूछा था— "इस देश में क्या हो रहा है? एक लड़की को सुरक्षा देने के बजाय आप उसे खत्म करने की साजिश रच रहे हैं?" सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था पर अविश्वास जताते हुए ही सारे केस दिल्ली ट्रांसफर किए थे, जो यूपी सरकार के चेहरे पर एक जोरदार तमाचा था।
2025 का संदेश
दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट का फैसला यह साबित करता है कि "सत्ता का संरक्षण अपराधी को बचा तो सकता है, लेकिन हमेशा के लिए नहीं।" कुलदीप सिंह सेंगर की उम्रकैद बरकरार रहना उन तमाम पुलिसकर्मियों और नेताओं के लिए एक चेतावनी है जो सोचते हैं कि वर्दी और कुर्सी उन्हें कानून से ऊपर बना देती है। पीड़िता आज भी पुलिस सुरक्षा में रहती है, क्योंकि उसे पता है कि 'सेंगर साम्राज्य' के अवशेष अभी भी सिस्टम में कहीं न कहीं दबे हुए हैं।









