इस धरती पर कुदरत ने महामानव की सृष्टि की है। जहां देवताओं की प्रथम देवभूमि विराजमान है, जहां गंगा की धाराएं स्वर्णिम आभा बिखेरती हैं, जहां ऋषि-मुनियों ने तप कर महावेदों की रचना की और जहां ऊंचे हिमशिखरों पर सबसे पहले सूरज की किरणें पड़ती हैं—उसी हिमनंद की गोद में बसा है मेरा उत्तराखंड। इसी देवभूमि की आत्मा को लोकगीतों, शब्दों और रंगमंच के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाने वाले महान लोक कलाकार थे
गढ़वाली गीतों के पुरोधा जीत सिंह नेगी।
बचपन से ही पहाड़ से जुड़ा मन
लोकगायक और रचनाकार जीत सिंह नेगी का जन्म 2 फरवरी 1925 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में हुआ। विश्वयुद्ध के कठिन दौर में उनका बचपन वर्मा में फौजियों के बीच बीता। बारूद की गंध और युद्ध का वातावरण भी उनके मन से पहाड़, गांव, पनघट और खसियारियों की स्मृतियों को मिटा नहीं सका। यही कारण था कि जब भी जीत सिंह नेगी लोकगीत गाते, श्रोताओं के मन में अपने पहाड़ लौटने की तीव्र इच्छा जाग उठती।
लोकसंस्कृति के सच्चे उपासक
कहा जाता है कि जीत सिंह नेगी उस दौर के महान गायक के.एल. सहगल से प्रभावित थे। उन्होंने सहगल की लय को अपनाया, लेकिन अपनी रचनाओं की आत्मा पूरी तरह पहाड़ी ही रखी। वे केवल एक लोकगायक या रचनाकार नहीं थे, बल्कि उत्तराखंड की पर्वतीय संस्कृति के सच्चे संवाहक थे।
उनकी प्रमुख रचनाओं में
‘गीत गंगा’, ‘जौंल मगरी’, ‘छम घुंघरू बाजला’, ‘मलेथा की कूल’ और ‘भारी भूल’ जैसी कालजयी लोककृतियां शामिल हैं, जो आज भी पहाड़ की संस्कृति और संवेदनाओं को जीवंत रखती हैं।
जनगणना सर्वेक्षण में भी मिली पहचान
जीत सिंह नेगी के लोकगीतों की लोकप्रियता और व्यापकता को भारत सरकार के जनगणना विभाग ने भी प्रमाणित किया। ग्राम सर्वेक्षण के दौरान सामूहिक रूप से सर्वप्रिय लोकगीतों की सूची में उनका गीत शामिल किया गया, जो अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती है।
नई पीढ़ी तक पहुंचे उनके गीत
नई पीढ़ी को जीत सिंह नेगी की रचनाओं से परिचित कराने का महत्वपूर्ण कार्य उत्तराखंड के प्रतिष्ठित लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी ने किया। उन्होंने जीत सिंह नेगी द्वारा गाए गए गीतों को अपनी आवाज में लयबद्ध कर रिकॉर्ड किया।
एक इंटरव्यू में नरेंद्र सिंह नेगी ने बताया कि दुबई में एक कार्यक्रम के दौरान कुछ बुजुर्गों ने उनसे कहा था कि भारत से उनके गाने तो मिल जाते हैं, लेकिन जीत सिंह नेगी की रिकॉर्डिंग उपलब्ध नहीं हो पाती। इसके बाद देहरादून में पोस्टिंग के दौरान 1991-92 में उन्होंने जीत सिंह नेगी से उनके गीत अपनी आवाज में गाने की अनुमति मांगी, जिस पर वे बेहद खुश हुए।
आंखों में आंसू, दिल में संतोष
जब उन गीतों के लेखन के बदले कंपनी ने जीत सिंह नेगी को 25 हजार रुपये का चेक दिया और वह चेक उन्हें सौंपा गया, तो उनकी आंखों में आंसू आ गए। यह खुशी सिर्फ पैसे की नहीं, बल्कि अपनी रचनाओं को जीवित होते देखने की थी।
उत्तराखंड के पहले रिकॉर्डेड लोकगायक
जीत सिंह नेगी उत्तराखंड के पहले लोकगायक थे, जिनके गीतों को 1947 में एचएमवी कंपनी ने उनकी ही आवाज में रिकॉर्ड किया। इसके बाद 1949 में यंग इंडिया ग्रामोफोन कंपनी ने उनके गीतों का ग्रामोफोन रिकॉर्ड जारी किया। यह उपलब्धि उन्हें लोकसंगीत के इतिहास में अमर बना देती है।
सांस्कृतिक धरोहर के अमर स्वर
जीत सिंह नेगी केवल एक कलाकार नहीं थे, वे उत्तराखंड की सांस्कृतिक चेतना थे। उनके गीत आज भी पहाड़ की मिट्टी, पीड़ा, प्रेम और प्रकृति की सुगंध से जुड़े हुए हैं। देवभूमि उत्तराखंड की आत्मा उनके सुरों में आज भी जीवित है और आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ती रहेगी।








