यह कहानी बिहार की राजनीति के सबसे प्रभावशाली और चर्चित ठिकाने—'10 सर्कुलर रोड'—की है। यह सिर्फ ईंट-पत्थर का एक ढांचा नहीं, बल्कि पिछले दो दशकों की बिहार की राजनीति का 'पावर सेंटर' रहा है। लेकिन आज जब राबड़ी देवी इस बंगले को खाली कर रही हैं, तो इसके पीछे केवल अदालती आदेश नहीं, बल्कि उन 'अशुभ' कहानियों और 'मनहूसियत' की चर्चा भी है, जिसने लालू परिवार को राजनीति और निजी जीवन में गहरे जख्म दिए हैं।
10 सर्कुलर रोड: सत्ता के शिखर से विदाई तक की दास्तां
1. एक युग का अंत: नेतृत्व विहीन राजद
वर्तमान में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) एक अजीब से संक्रमण काल से गुजर रहा है। पार्टी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव अपनी आंखों के ऑपरेशन के बाद दिल्ली में अपनी सांसद बेटी मीसा भारती के आवास पर स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं। दूसरी ओर, पार्टी की कमान संभालने वाले तेजस्वी यादव के बारे में चर्चा है कि वे देश से बाहर हैं। नेतृत्व की इस अनुपस्थिति में राजद के दूसरे और तीसरे दर्जे के नेता ऐसे बयान दे रहे हैं जिनका न कोई सिर है न पैर। जब एनडीए ने दावा किया कि राजद के विधायक पाला बदल सकते हैं, तो जवाब में राजद ने भी जदयू में टूट की भविष्यवाणी कर दी। लेकिन असली हलचल राबड़ी आवास पर है, जहाँ से शिफ्टिंग का काम शुरू हो चुका है।
2. साधु यादव और 'मनहूसियत' की शुरुआत
इस बंगले की कहानी लालू परिवार के सत्ता में रहने के दौरान शुरू हुई थी। तब यह बंगला राबड़ी देवी के भाई अनिरुद्ध प्रसाद यादव उर्फ साधु यादव के नाम पर आवंटित था। साधु यादव करीब 10 साल तक यहां रहे। लालू-राबड़ी राज में साधु की तूती बोलती थी, उन पर फिल्में तक बनीं। लेकिन कहा जाता है कि इस बंगले में कदम रखने के बाद ही रिश्तों में दरार आनी शुरू हुई।
बहन राबड़ी और बहनोई लालू से साधु यादव के रिश्ते यहीं से बिगड़ने शुरू हुए। आज आलम यह है कि साधु और सुभाष (दोनों साले) लालू परिवार के सबसे बड़े आलोचक हैं। साधु यादव, जो कभी राजद के स्तंभ थे, आज राजनीतिक जमीन तलाशने के लिए दर-दर भटक रहे हैं। कांग्रेस, बसपा और अपनी पार्टी बनाने के बावजूद उन्हें वह मुकाम दोबारा हासिल नहीं हुआ।
3. पारिवारिक कलह और बिखराव का गवाह
2005 में सत्ता जाने के बाद राबड़ी देवी को यह बंगला पूर्व मुख्यमंत्री और फिर नेता प्रतिपक्ष के नाते मिला। करीब 20 साल तक यह परिवार यहीं रहा, लेकिन इसी बंगले ने परिवार के टूटने के कई मार्मिक दृश्य देखे:
- तेज प्रताप और ऐश्वर्या का रिश्ता: लालू के बड़े बेटे तेज प्रताप की शादी बड़े धूमधाम से हुई थी। बहू ऐश्वर्या राय ने इसी बंगले में पहला कदम रखा, लेकिन कुछ ही समय बाद उन्हें अपमानित होकर यहीं से अपने मायके लौटना पड़ा।
- बेटों के बीच दूरी: तेज प्रताप यादव ने भी इसी बंगले में रहते हुए परिवार से अलग होने का 'निर्दयी' फैसला लिया और अपना अलग सरकारी आवास बना लिया।
- रोहिणी आचार्य का दर्द: लालू को किडनी देने वाली बेटी रोहिणी आचार्य, जिन्हें पूरा देश एक आदर्श बेटी मानता है, उनके बारे में भी चर्चा है कि हाल के बिहार चुनाव नतीजों के बाद उन्हें इसी बंगले में अपमान सहना पड़ा, जिसके बाद वे रोती हुई बाहर निकलीं। आज वे अपने भाई तेजस्वी के बजाय नीतीश कुमार से महिलाओं की सुरक्षा की गुहार लगा रही हैं।
4. सियासी उतार-चढ़ाव और 'पावर सेंटर' का अंत
10 सर्कुलर रोड वह जगह थी जहाँ मकर संक्रांति पर दही-चूड़ा की दावत होती थी, होली पर कुर्ता फाड़ जश्न होता था और रमजान में इफ्तार की रौनक दिखती थी। लालू यादव जमानत पर रिहा होने के बाद इसी को अपना मुख्य ठिकाना बनाए हुए थे। लेकिन वक्त बदला, 2019 में पटना हाईकोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन बंगला देने के नियम को असंवैधानिक करार दिया।
हालाँकि, राबड़ी देवी नेता प्रतिपक्ष थीं, इसलिए वे तकनीकी तौर पर वहां टिकी रहीं। अब जब यह बंगला खाली हो रहा है, तो राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि क्या इस बंगले की 'नकारात्मक ऊर्जा' ने राजद के स्वर्णिम युग को समाप्त कर दिया?
5. क्या कहता है भविष्य?
राजद के समर्थक इसे महज एक स्थान परिवर्तन मान सकते हैं, लेकिन विरोधियों के लिए यह लालू परिवार के राजनीतिक पतन का प्रतीक है। जिस बंगले ने साधु यादव का करियर खत्म किया, जहाँ बहुओं और बेटियों के आंसू गिरे, और जहाँ बैठकर लिए गए फैसले अक्सर विवादों में रहे, उस बंगले से विदाई लेना राबड़ी देवी के लिए किसी अंत से कम नहीं है।
अब लालू परिवार का नया ठिकाना क्या होगा और क्या वहां से राजद अपनी खोई हुई साख वापस पा सकेगी, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। लेकिन 10 सर्कुलर रोड की दीवारों में दफन किस्से हमेशा बिहार की राजनीति के एक विवादास्पद अध्याय के रूप में याद किए जाएंगे।
चलिए, इस कहानी को थोड़ा और गहराई में ले जाते हैं और उन पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करते हैं जिन्होंने 10 सर्कुलर रोड को बिहार की राजनीति का सबसे रहस्यमयी और 'अशुभ' माना जाने वाला बंगला बना दिया।
10 सर्कुलर रोड: सत्ता, साजिश और आंसुओं की एक अनकही दास्तां
बिहार की राजधानी पटना के वीवीआईपी इलाके में स्थित यह बंगला महज़ एक सरकारी आवास नहीं रहा है। यह पिछले तीन दशकों के बिहार के इतिहास का वह मूक गवाह है, जिसने अर्श से फर्श तक का सफर देखा है। इसे समझने के लिए हमें इसके इतिहास की उन परतों को खोलना होगा, जहाँ राजनीति और परिवार के बीच की लकीरें धुंधली हो गईं।
1. साधु यादव: एक 'किंगमेकर' का पतन
इस बंगले की 'मनहूसियत' की कहानी सबसे पहले लालू यादव के साले अनिरुद्ध प्रसाद यादव उर्फ साधु यादव से जुड़ती है। 90 के दशक में बिहार में एक कहावत मशहूर थी—"बिहार में दो ही यादव, एक लालू और दूसरा साधु।"
- सत्ता का समानांतर केंद्र: जब लालू-राबड़ी मुख्यमंत्री थे, तब यह बंगला साधु यादव के नाम पर आवंटित था। यहाँ से बिहार की नौकरशाही चलती थी। बड़े-बड़े अधिकारी साधु यादव के दरबार में हाजिरी लगाते थे।
- रिश्तों में जहर: अजीब इत्तेफाक देखिए, जैसे-जैसे साधु यादव इस बंगले में शक्तिशाली हुए, उनके अपने ही बहनोई (लालू) और बहन (राबड़ी) से रिश्ते बिगड़ने लगे। इसी बंगले में रहते हुए उन पर 'शोरूम से गाड़ियां उठाने' और 'अपहरण' जैसे संगीन आरोप लगे, जिससे लालू की छवि धूमिल हुई।
- राजनीतिक वनवास: अंततः उन्हें इसी बंगले से बाहर का रास्ता दिखाया गया। उसके बाद साधु यादव ने कांग्रेस, बसपा और न जाने कितनी पार्टियां बदलीं, लेकिन वे कभी चुनाव नहीं जीत सके। आज वे अपनी राजनीतिक पहचान के लिए संघर्ष कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि इस बंगले ने साधु यादव को 'शून्य' पर ला दिया।
2. ऐश्वर्या राय: उस 'कुलवधू' की सिसकियाँ
10 सर्कुलर रोड की दीवारों ने शायद सबसे दर्दनाक दृश्य तब देखा जब बिहार के एक अन्य दिग्गज नेता दरोगा राय की पोती और तेज प्रताप यादव की पत्नी ऐश्वर्या राय बहू बनकर इस घर में आईं।
- उम्मीदों का महल: शादी के समय लगा था कि दो बड़े राजनीतिक घरानों का मिलन राजद को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा।
- सड़क पर आया विवाद: कुछ ही महीनों में इसी बंगले के भीतर से चीखने-चिल्लाने की खबरें आने लगीं। वह मंजर आज भी लोगों के जेहन में ताजा है जब ऐश्वर्या राय बारिश में भीगती हुई, रोते हुए इसी बंगले के गेट से बाहर निकली थीं। उन्होंने आरोप लगाया था कि उन्हें घर में प्रताड़ित किया गया। एक प्रतिष्ठित परिवार की बहू का इस तरह बेइज्जत होकर निकलना इस बंगले की छवि पर एक गहरा दाग छोड़ गया।
3. तेज प्रताप: अपनों के बीच 'अजनबी'
लालू यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव, जो स्वभाव से थोड़े अलग और धार्मिक प्रवृत्ति के माने जाते हैं, उनका भी इस बंगले से मोहभंग इसी 'अशुभ' माहौल की वजह से हुआ।
- पारिवारिक अलगाव: तेज प्रताप अक्सर आरोप लगाते रहे कि उनके आसपास के कुछ लोग (जिन्हें वे 'शकुनि' कहते थे) उन्हें उनके परिवार और भाई तेजस्वी से दूर करना चाहते हैं। इसी बंगले में रहते हुए उन्होंने खुद को इतना अकेला महसूस किया कि आखिरकार उन्होंने अपनी मां और पिता का साथ छोड़कर अलग सरकारी आवास ले लिया।
4. रोहिणी आचार्य: 'किडनी' देने वाली बेटी का दर्द
हालिया घटनाक्रम सबसे अधिक चौंकाने वाला है। लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य, जिन्होंने अपनी किडनी देकर पिता को नया जीवन दिया, उन्हें राजद का सबसे मजबूत स्तंभ माना जाता था।
- अपमान का घूंट: चर्चाएं गर्म हैं कि हाल के दिनों में इसी 10 सर्कुलर रोड के भीतर कुछ ऐसी बहसें हुईं, जिससे रोहिणी आहत हुईं। सोशल मीडिया पर मुखर रहने वाली रोहिणी का अचानक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (जो राजद के विरोधी हैं) से मार्मिक अपील करना यह बताता है कि घर के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है। क्या तेजस्वी यादव के वर्चस्व की लड़ाई में रोहिणी को किनारे किया जा रहा है?
5. कानूनी शिकंजा और नेतृत्व का संकट
राजनीतिक रूप से भी यह बंगला राजद के लिए कुछ खास सुखद नहीं रहा:
- छापेमारी का केंद्र: लैंड फॉर जॉब स्कैम (जमीन के बदले नौकरी) मामले में सीबीआई और ईडी की कई छापेमारी इसी बंगले में हुईं। लालू परिवार के सदस्य घंटों इसी परिसर में पूछताछ का सामना करते रहे।
- नेतृत्व विहीन पार्टी: आज जब राबड़ी देवी सामान बांध रही हैं, तो तेजस्वी यादव बिहार से नदारद हैं। पार्टी के कार्यकर्ताओं में भ्रम की स्थिति है। दूसरे दर्जे के नेता ऐसे बयान दे रहे हैं जैसे उनके पास कोई ठोस रणनीति न हो।
क्या पता बदलने से किस्मत बदलेगी?
10 सर्कुलर रोड का खाली होना केवल एक शिफ्टिंग नहीं है, बल्कि बिहार की राजनीति के एक 'विवादास्पद पावर हाउस' का बंद होना है। अंधविश्वास कहें या संयोग, लेकिन यह सच है कि इस बंगले में रहने वाला हर शख्स किसी न किसी बड़े विवाद या व्यक्तिगत त्रासदी से गुजरा है।
अब लालू-राबड़ी का नया पता क्या होगा, यह तो जल्द साफ हो जाएगा, लेकिन सवाल यह है कि क्या वे उस 'नकारात्मकता' को पीछे छोड़ पाएंगे जो पिछले 20 सालों से इस बंगले के साथ जुड़ी रही?
इस कहानी को अब उस निर्णायक मोड़ पर ले चलते हैं जहाँ राजनीति, कानूनी दांव-पेंच और पुराने रिश्तों की कड़वाहट एक साथ मिलती है। '10 सर्कुलर रोड' के खाली होने के पीछे केवल 'किस्मत' का खेल नहीं है, बल्कि इसके पीछे 'लैंड फॉर जॉब स्कैम' की कानूनी तलवार और नीतीश कुमार के साथ बदलते रिश्तों की एक लंबी बिसात भी है।
10 सर्कुलर रोड: कानूनी चक्रव्यूह और बिखरते राजनीतिक समीकरण
1. लैंड फॉर जॉब स्कैम: बंगले की दीवारों तक पहुंची जांच
इस बंगले की 'मनहूसियत' का एक बड़ा अध्याय भ्रष्टाचार के उन आरोपों से जुड़ा है, जिसने लालू परिवार की नींद उड़ा दी। 'लैंड फॉर जॉब स्कैम' (जमीन के बदले नौकरी का मामला) ने 10 सर्कुलर रोड की चौखट पर सीबीआई (CBI) और ईडी (ED) को लाकर खड़ा कर दिया।
- छापेमारी का मंजर: कई बार ऐसा हुआ कि तड़के सुबह जब पूरा शहर सो रहा होता था, केंद्रीय जांच एजेंसियों की गाड़ियां इसी बंगले के बाहर कतार में खड़ी मिलती थीं। घंटों तक पूछताछ, दस्तावेजों की छानबीन और लालू-राबड़ी के साथ-साथ तेजस्वी से घंटों तक सवाल-जवाब ने इस बंगले के 'पावर सेंटर' वाली हनक को कमजोर कर दिया।
- भविष्य पर संकट: इसी बंगले में बैठकर वह रणनीतियां बनी थीं, जिन्हें अब अदालत में चुनौती दी जा रही है। राजनीतिक पंडित कहते हैं कि इसी आवास में रहते हुए जो 'जमीन के खेल' हुए, वही आज लालू परिवार के राजनीतिक भविष्य के लिए सबसे बड़ा कांटा बन गए हैं।
2. लालू-नीतीश: कभी 'बड़े भाई', कभी 'बड़े दुश्मन'
इस बंगले ने बिहार की राजनीति के सबसे बड़े 'लव-हेट' रिलेशनशिप (प्रेम और नफरत के रिश्ते) को भी देखा है।
- भरोसे का टूटना: 2015 में जब महागठबंधन बना, तो लगा कि लालू और नीतीश की जोड़ी अटूट है। इसी बंगले से नीतीश कुमार और लालू यादव की साथ में मुस्कुराती हुई तस्वीरें आती थीं। लेकिन 2017 में जब नीतीश ने पाला बदला, तो इसी बंगले में 'धोखे' की चर्चाएं हुईं।
- नीतीश की तरफ झुकाव: आज जब लालू परिवार संकट में है, तो उनकी अपनी ही बेटी रोहिणी आचार्य का नीतीश कुमार की तारीफ करना और उनसे मदद मांगना बहुत कुछ बयां करता है। रोहिणी का यह कहना कि "नीतीश कुमार महिलाओं के अधिकारों के प्रति संवेदनशील हैं", इस बंगले के भीतर तेजस्वी यादव के नेतृत्व पर एक मौन सवाल खड़ा करता है। यह संकेत देता है कि परिवार के भीतर ही अब नीतीश कुमार को 'दुश्मन' के बजाय एक 'भरोसेमंद विकल्प' के रूप में देखा जा रहा है।
3. नेतृत्व का संकट: तेजस्वी का 'रहस्यमयी' प्रवास
जब पार्टी सबसे बुरे दौर में है, राबड़ी देवी अपना सामान समेट रही हैं, और लालू यादव बीमार हैं, तब तेजस्वी यादव का बिहार में न होना राजद कार्यकर्ताओं को खल रहा है।
- नेतृत्वहीन सेना: राजद के विधायक और कार्यकर्ता आज असमंजस में हैं। 10 सर्कुलर रोड, जो कभी कार्यकर्ताओं की भीड़ से गुलजार रहता था, आज वहां सन्नाटा है। दूसरे दर्जे के नेता जैसे शिवानंद तिवारी या जगदानंद सिंह भी अब उस सक्रियता में नहीं दिखते।
- बयानबाजी का दौर: जब नेतृत्व गायब होता है, तो अनुशासन भी गायब हो जाता है। राजद नेताओं द्वारा जदयू में टूट के दावे करना महज एक 'बचाव की मुद्रा' (defensive mode) नजर आता है, क्योंकि उन्हें डर है कि कहीं एनडीए उनके अपने कुनबे में सेंध न लगा दे।
4. राबड़ी देवी की विदाई: एक भारी मन से लिया गया फैसला
राबड़ी देवी ने लंबे समय तक इस बंगले को बचाने की कोशिश की। राजद के नेता चिल्लाते रहे कि "बंगला खाली नहीं करेंगे", "यह हमारा हक है"। लेकिन कानूनी पेचीदगियों और हाईकोर्ट के सख्त रुख के आगे आखिरकार झुकना पड़ा।
- शिफ्टिंग का दर्द: 20 साल की यादें, कई शादियां, कई चुनाव और कई उतार-चढ़ाव इस बंगले से जुड़े हैं। जब 10 सर्कुलर रोड से ट्रक बाहर निकल रहे हैं, तो यह केवल सामान की शिफ्टिंग नहीं है, बल्कि उस 'लालू युग' के प्रतीक का अंत है जिसने दो दशकों तक बिहार को अपनी उंगलियों पर नचाया।
एक नए दौर की आहट?
10 सर्कुलर रोड के खाली होने के साथ ही लालू परिवार के जीवन का एक बड़ा अध्याय बंद हो गया है। अब सवाल यह है कि:
- क्या नया आवास लालू परिवार की 'किस्मत' बदल पाएगा?
- क्या तेजस्वी यादव वापस लौटकर पार्टी को बिखरने से बचा पाएंगे?
- और सबसे बड़ा सवाल—क्या रोहिणी आचार्य और नीतीश कुमार के बीच बढ़ती यह 'सहानुभूति' बिहार में किसी नए गठबंधन का इशारा है?
बिहार की राजनीति में 'पता' बदलना अक्सर 'सत्ता' बदलने का संकेत होता है। देखना दिलचस्प होगा कि इस 'मनहूस' कहे जाने वाले बंगले को छोड़ने के बाद लालू परिवार के सितारे दोबारा चमकते हैं या गर्दिश में ही रहते हैं।









